April 14, 2024

ऊना में आम की फसल तेला व मैंगो होप्पर रोग की चपेट में

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जिला में 2275 हेक्टेयर एरिया में की जाती है आम की खेती

बेमौसम बारिशों की वजह से जिला में पनपा यह रोग : विभाग

अजय शर्मा, बंगाणा, ऊना जिला में फलों का राजा कहे जाने वाले आम की खेती तेला व मैंगो होप्पर रोग की चपेट में आ गई है। इन बीमारियों ने जिले के लाखों बागवानों को सोचने के लिए विवश कर दिया है कि किस प्रकार वह आम की फसल को भयंकर बीमारियों से बचाएं। हालांकि इससे पूर्व जिला में आम की बंपर फसल होने का अनुमान विभाग द्वारा लगाया जा रहा था व बागवान भी आम के पेड़ों पर ज्यादा अंकुर आने से खुश थे लेकिन बेमौसम बारिश ने जिला के वातावरण में नमी उत्पन्न कर दी जिसके कारण आम के पौधों के अंकुर को कीटों ने खाना आरंभ कर दिया है। वर्तमान समय में आम के पौधों पर आया अंकुर काला फिर गया है व पौधों से पानी टपकना शुरू हो गया है। बागवानी विभाग के अधिकारियों के मुताबिक ऊना जिला में हजारों बागबान परिवारों द्वारा आम की खेती की जाती है। वर्तमान समय में जिला में 2275 हेक्टेयर भूमि पर बागबानों द्वारा आम की खेती की जा रही है। क्षेत्र के किसान आम की फसल से अच्छा मुनाफा कमा लेते थे लेकिन इस वर्ष मौसम में नमी के कारण बागबानों की आम की फसल बीमारी की चपेट में आ गई है। बागवानी विभाग के अधिकारियों ने किसानों से आग्रह किया है कि बागवान खंड स्तर पर विभाग के कार्यालय से संपर्क करके इन बीमारियों से निजात के लिए अधिकारियों की सलाह लें।

आम में लगने वाले रोग तेला व मैंगो होप्पर रोकथाम कैसे करें

यह आम का प्रमुख कीट होता है। ये हरे मटमैले कीट कलियों, फूल की डंड्डियों व नई पत्तियों का रस चूसते हैं, जिससे वे मुरझाकर सुख जाती हैं। साल में फरवरी, अप्रैल, जून व जुलाई के दौरान इस कीट की दो पीढ़ियां होती है। इसके बचाव के लिए पेड़ों को ज्यादा दूरी पर लगाना चाहिए, ताकि अच्छी तरह सूर्य का प्रकाश मिल सके। बाग में पानी की निकासी सही रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त मैलाथिओन 50 ईसी 500 मिली या कार्बेरिल 50 डल्यूपी की 1.5 किलोग्राम मात्रा को 500 लीटर पानी में मिलाकर फरवरी के अंत में व दोबारा मार्च के अंत में छिड़काव करने से कीट प्रभावी तरीके से नियंत्रित होता है। जिन बागवानों के आम के पेड़ों में इस समय यह रोग लगे हैं वह बिना समय गंवाए उपरोक्त दवाइयों का इस्तेमाल विभाग की सलाह के मुताबिक करें।

आम का मिलीबग व तना छेदक कीट से बचाव

दिसंबर व जनवरी के दौरान ज्यादातर अखरोट जैसे दिखने वाले मिलीबग जमीन में अण्डों से निकलकर पेड़ पर चढ़कर पत्तियों के नीचे जमा हो जाता है। ये कीट जनवरी से अप्रैल तक बढ़ने वाली टहनियों पर गुच्छों की तरह जमा होकर रस चूसते है, जिसके परिणाम स्वरूप टहनियां सूखने लगती हैं। इसके बचाव के लिए दिसंबर के मध्य भूमि से एक मीटर की ऊंचाई तने पर 30 सेंटीमीटर छोड़ी पॉलिथीन की पट्टी लगनी चाहिए व पट्टी के नीचे एकत्रित कीटों को खत्म करने के लिए प्रोफेनीफोस 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में या डाइजियान 20 ईसी 250 मिली को 50 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाना चाहिए।
तना छेदक कीट की सुंड़ियां 6 से 8 सेंटीमीटर लंबी पीले रंग की होती हैं। जिनके मुखांग बहुत मजबूत होते हैं। ये कीट तने व शाखाओं में छाल के नीचे लकड़ी में सुरंग बनाकर उसको अंदर से खा जाती हैं। इसके बचाव के लिए जून, जुलाई के दौरान पेड़ों के नीचे अच्ची जुताई की जानी चाहिए, ताकि सूर्य की गर्मी से कीट खत्म हो जाए. इसके अतिरिक्त तने के सुराग पर 2ml कोनफीढोर को एक लीटर पानी में मिलाकर छेद में डालकर मिट्टी से बंद करने से कीट मर जाते हैं।

क्या कहते हैं बागवानी डिप्टी डायरेक्टर

इस संबंध में बागवानी डिप्टी डायरेक्टर डॉक्टर संतोष कुमार बख्शी ने कहा कि बेमौसम बारिश की वजह से यह रोग फैल रहा है। जिले के बागवान बागवानी विभाग में आकर अधिकारियों से सलाह लें। मौसम में नमी की वजह से यह रोग पनपा है। अच्छी किस्म की दवाइयों की स्प्रे करके बची हुई फसल को बचाया जा सकता है।

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