भारत में 19 गुना तक बढ़ गया जानलेवा गर्मी का प्रकोप
19 गुना बढ़ा ‘साइलेंट किलर’ का खौफ
नई दिल्ली मौसम के बदलते मिजाज ने पूरी दुनिया को परेशानी में डाल रखा है, लेकिन भारत के लिए एक बेहद डराने वाली खबर सामने आई है। चिलचिलाती धूप से ज्यादा अब हवा में मौजूद जानलेवा नमी (ह्यूमिडिटी) लोगों के लिए ‘साइलेंट किलर’ बनती जा रही है। हाल ही में हुए एक बड़े वैज्ञानिक शोध ने इस बात का खुलासा किया है कि खतरनाक नमी वाली गर्मी की मार झेलने के मामले में भारत दुनिया का सबसे ज्यादा प्रभावित देश बन गया है। इस स्टडी के आंकड़े इतने भयावह हैं कि यह किसी भी आम इंसान और खासकर दिन-रात खुले में मेहनत करने वाले कामगारों की चिंता बढ़ाने के लिए काफी हैं।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी (IITM) और गुवाहाटी यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए इस संयुक्त शोध को ‘जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च: एटमॉस्फियर्स’ में प्रकाशित किया गया है। इसमें साल 1950 से लेकर 2020 तक के वैश्विक आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि दुनिया भर में खतरनाक नमी वाली गर्मी के संपर्क में आने की दर 1950 के दशक के मुकाबले लगभग 16 गुना बढ़ गई है। लेकिन भारत की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है, जहां इसमें सीधे तौर पर 19 गुना का भारी इजाफा दर्ज किया गया है। पूरी दुनिया में हो रही इस बढ़ोतरी का लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत झेल रहा है। स्टडी के मुताबिक, 33 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा ‘वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर’ (WBGT) को शरीर के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।
इस उमस भरी और जानलेवा गर्मी का सबसे भयानक असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो शारीरिक श्रम करते हैं। शोधकर्ताओं ने अपनी स्टडी में व्यावसायिक उत्पादकता को होने वाले नुकसान की भी गहन जांच की है। चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, 1950 के दशक में भारत में एक कामगार औसतन साल में 12 दिन (आठ घंटे की शिफ्ट के हिसाब से) इस खतरनाक गर्मी का सामना करता था। लेकिन 2020 के दशक तक आते-आते यह आंकड़ा भयानक रूप से बढ़कर 65 कार्य-दिवसों तक पहुंच गया है। लंबे समय तक इस खतरनाक स्तर की नमी वाली गर्मी में काम करने से न सिर्फ शारीरिक क्षमता घट रही है, बल्कि यह सीधे तौर पर इंसान की जान के लिए भी बड़ा खतरा बन गई है।
भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से, विशेषकर राजधानी दिल्ली में तो स्थिति और भी तेजी से बिगड़ रही है। IITM के वैज्ञानिक सुबोध कुमार साहा के अनुसार, भले ही थर्मामीटर पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से नीचे दिखाई दे, लेकिन हवा में मौजूद भारी नमी के कारण लोगों को 45 डिग्री वाली झुलसाने वाली गर्मी का ही अहसास होता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इस नमी वाली गर्मी में अचानक और तेज बदलाव 1980 के दशक से शुरू हुआ था। इसके पीछे मुख्य रूप से लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान, इंडो-पैसिफिक वार्म पूल में हो रहे समुद्री बदलाव और बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार माना गया है। 1950 के बाद से भारत की कामकाजी उम्र वाली आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी है, जिसके कारण इस मौसमी खतरे का असर भी कई गुना ज्यादा व्यापक और जानलेवा हो गया है।
