अमेरिका ने होर्मुज में की नाकेबंदी तो चीन ने दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत की
नई दिल्ली, मध्य पूर्व में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एशिया में चीन ने भी रणनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है। जहां दुनिया की नजर तेल आपूर्ति के इस अहम मार्ग पर टिकी है, वहीं चीन दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटा है।
चीन विवादित स्कारबोरो शोल क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ा रहा है, जो लंबे समय से फिलीपींस और चीन के बीच विवाद का केंद्र रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, चीन ने यहां नावों, कोस्ट गार्ड जहाजों और एक बड़े फ्लोटिंग बैरियर के जरिए प्रवेश को सीमित करने की कोशिश की है।
स्कारबोरो शोल मछली संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है, जहां फिलीपींस के मछुआरे वर्षों से जाते रहे हैं। हालांकि चीन इस इलाके पर अपना दावा करता है, जबकि यह फिलीपींस के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन के भीतर आता है।
हालिया घटनाक्रम में चीन ने करीब 350 मीटर लंबा फ्लोटिंग बैरियर लगाकर इलाके में प्रवेश रोकने का प्रयास किया। इसके साथ ही कई चीनी मछली पकड़ने वाली नौकाएं और कोस्ट गार्ड जहाज तैनात किए गए। फिलीपींस का आरोप है कि चीन मैरीटाइम मिलिशिया के जरिए दबाव बना रहा है और उसके मछुआरों को क्षेत्र से दूर कर रहा है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलीपींस ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए अपने कोस्ट गार्ड और नौसेना के जहाज तैनात किए हैं, जिससे टकराव का खतरा बढ़ गया है। यह तनाव अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका भी फिलीपींस के समर्थन में सक्रिय है। हाल ही में दोनों देशों ने क्षेत्र के पास संयुक्त सैन्य अभ्यास किए हैं। फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन मौजूदा वैश्विक परिस्थिति का लाभ उठा रहा है। क्योंकि अमेरिका का ध्यान फिलहाल ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य पर केंद्रित है, ऐसे में चीन दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
गौरतलब है कि चीन 2012 से ही स्कारबोरो शोल पर प्रभावी नियंत्रण बनाए हुए है। 2016 में अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण ने फिलीपींस के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन चीन ने उसे मानने से इनकार कर दिया। तब से यह क्षेत्र लगातार तनाव का केंद्र बना हुआ है।
मौजूदा स्थिति में एक ओर मध्य पूर्व में तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग दबाव में है, वहीं दूसरी ओर एशिया में व्यापार और समुद्री सुरक्षा से जुड़ा अहम मार्ग भी जोखिम में नजर आ रहा है।
