कांगड़ा का सैर उत्सव: परंपरा, संस्कृति और उल्लास का अनूठा संगम
धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा की समृद्ध लोक संस्कृति में सैर त्योहार का विशेष स्थान है। बदलते समय के साथ जीवनशैली भले ही बदल गई हो, लेकिन कांगड़ा की मिट्टी में रची-बसी इस परंपरा की खुशबू आज भी लोगों के दिलों में कायम है।
सैर को नई फसल, प्रकृति और खुशहाली के प्रति कृतज्ञता का पर्व माना जाता है। सावन-भादों के बाद खेत-खलिहानों में हरियाली और ग्रामीण जीवन में नई उमंग के बीच यह त्योहार उल्लास के साथ मनाया जाता है। घरों में पारंपरिक पकवान बनते हैं और परिवार के लोग मिलकर खुशियां साझा करते हैं।
बैजनाथ उपमंडल में सैर की एक खास परंपरा बच्चों के अखरोट खेलने की है। बच्चे अखरोट खेलते हुए उन्हें इकट्ठा करते हैं। वहीं कांगड़ा के कई क्षेत्रों में सैर की पूर्व संध्या पर एक विशेष वर्ग द्वारा टोकरी में इस मौसम में तैयार होने वाली फसलों को सजाया जाता है। इस टोकरी को घर-घर ले जाकर उसकी पूजा की जाती थी। समय के साथ कुछ स्थानों पर यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है, लेकिन कई गांवों में आज भी इसकी झलक देखने को मिलती है।
सैर के अवसर पर लगने वाले मेले और सांस्कृतिक आयोजन लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से कांगड़ा की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर देते हैं। यह पर्व रिश्तों में मिठास और समाज में आपसी भाईचारे का संदेश भी देता है।
आज जरूरत है कि सैर जैसी लोक परंपराओं को केवल त्योहार के रूप में नहीं, बल्कि कांगड़ा की सांस्कृतिक पहचान के रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।
सैर कांगड़ा की उस मिट्टी की खुशबू है, जिसमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, परिवार का प्रेम, सामाजिक भाईचारा और लोक संस्कृति की मिठास एक साथ महसूस होती है।
