August 27, 2026

कोई महिला आजीविका के लिए वेश्यावृत्ति करे, तो वह जगह कोठा नहीं: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, देश में वेश्यावृत्ति और उससे जुड़े कानूनों की व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 का उद्देश्य वेश्यावृत्ति को पूरी तरह समाप्त करना या इसे स्वयं में अपराध घोषित करना नहीं है, बल्कि इसके पीछे मौजूद शोषण, मानव तस्करी और संगठित व्यावसायिक नेटवर्क पर रोक लगाना है।

दो सदस्यीय पीठ, जस्टिस जे बी पार्दीवाला और जस्टिस आर महादेवन ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि कानून का मुख्य लक्ष्य उन लोगों पर कार्रवाई करना है जो वेश्यावृत्ति को व्यवसाय बनाकर आर्थिक लाभ कमाते हैं, न कि उन महिलाओं को अपराधी ठहराना जो इस पेशे में हैं।

वेश्यालयों से मुक्त कराई गई महिलाओं के पुनर्वास से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 70 वर्ष पुराने कानून का व्यापक विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि 20वीं सदी के शुरुआती दौर में महिलाओं और लड़कियों की तस्करी एक गंभीर सामाजिक समस्या थी और उस समय समाज में इसे नैतिक दृष्टि से अनुचित माना जाता था। इसी कारण कानून के नाम में “अनैतिक” शब्द शामिल किया गया।

कोर्ट ने कहा कि यह कानून मूल रूप से तस्करों, दलालों और शोषण करने वाले गिरोहों को दंडित करने के लिए बनाया गया था, न कि उन महिलाओं को सजा देने के लिए जो स्वयं इस पेशे में हैं।

अपने विस्तृत फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून की कुछ धाराएं विशेष परिस्थितियों में लागू होती हैं। इनमें सार्वजनिक स्थलों, शैक्षणिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों या अधिसूचित क्षेत्रों के आसपास वेश्यावृत्ति या ग्राहकों को आकर्षित करने जैसी गतिविधियों को दंडनीय माना गया है।

पीठ ने कहा कि इन प्रावधानों का उद्देश्य सार्वजनिक शालीनता, सामाजिक व्यवस्था और नागरिकों की सुविधा बनाए रखना है। इसलिए सार्वजनिक स्थानों पर ऐसी गतिविधियों को नियंत्रित करना कानून के दायरे में आता है।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह टिप्पणी रही जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने वेश्यालय की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी आजीविका के लिए अकेले अपने निवास स्थान से काम करती है और वहां किसी अन्य महिला, दलाल, एजेंट या बिचौलिए की कोई भूमिका नहीं है, तो उस स्थान को कानून के तहत वेश्यालय नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई और कानून की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि वर्तमान कानूनी ढांचे में कुछ अस्पष्टताएं मौजूद हैं। अदालत के अनुसार, वेश्यावृत्ति को अक्सर केवल शोषण और अपमान के नजरिए से देखा जाता है, जबकि वास्तविक परिस्थितियां कई बार अधिक जटिल होती हैं। इसलिए कानून की व्याख्या करते समय संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत ने एक ओर शोषण और तस्करी के खिलाफ सख्त रुख कायम रखा है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया है कि कानून का उद्देश्य केवल पेशे में शामिल व्यक्तियों को अपराधी घोषित करना नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय देश में वेश्यावृत्ति से जुड़े कानूनी और सामाजिक विमर्श को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।

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