June 20, 2024

दलितों पर अत्याचार ठीक नहीं, दलित उत्पीड़न रोकने के लिए बनायें सख्त से सख्त कानून: बंडारू दत्तात्रेय

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राज्यपाल दत्तात्रेय ने डीसीआरयूएसटी में आयोजित संविधान निर्माता की 132वीं जयंती समारोह में शामिल हो किया नमन

शिवालिक पत्रिका, चंडीगढ़,      हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने संविधान निर्माता डॉ. बीआर अंबेडकर की 132वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए कहा कि बाबा साहब ने सदैव दलित-गरीब उत्थान के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनके अंत्योदय के सिद्धांत को ही आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री मनोहर लाल क्रियान्वित करते हुए देश-प्रदेश को विकास पथ पर आगे बढ़ा रहे हैं।
राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (डीसीआरयूएसटी) में आयोजित बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर की 132वीं जयंती समारोह में उपस्थित जनसमूह को बतौर मुख्यातिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आज भी दलित अत्याचार की घटनाएं सामने आती हैं, जो उचित नहीं है। इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार को सख्त से सख्त कानून बनाना चाहिए। राज्यपाल दत्तात्रेय ने कहा कि डा. अंबेडकर की शिक्षा व संदेश का अनुसरण करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने में जुटे हैं। इसमें अंत्योदय बहुत आवश्यक है, जिसके लिए उन्होंने गरीब वर्ग को स्टार्टअप शुरु करने के लिए दो करोड़ रुपये का ऋण प्रदान करने की योजना शुरू की है। वे भारत को विश्वगुरू बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस दिशा में सबको योगदान देना चाहिए। हमें देश को पुनः: विश्व गुरु बनाने के लिए एकजुटता के साथ आगे बढ़ते हुए हर प्रकार के भेदभाव को मिटाना होगा। बाबा साहब डा. अंबेडकर ने भी सर्वसमाज के कल्याण के लिए काम किया। वे मात्र दलित नेता नहीं अपितु देश की 135 करोड़ जनता के नेता हैं। इसी भावना के साथ प्रधानमंत्री मोदी भी विकास पथ पर अग्रसर हैं। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर द्वारा दिए गए तीन संदेशों संगठित, संघर्ष व ज्ञान प्राप्ति की चर्चा करते हुए राज्यपाल ने कहा कि इनको आत्मसात करते हुए ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिए। ज्ञान के महत्व और शक्ति को महसूस करते हुए डा0 अम्बेडकर ने संयुक्त राज्य अमेरिका में उच्च शिक्षा का अध्ययन किया। उन्होंने न्यूयॉर्क शहर के कोलंबिया विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय वाणिज्य पर अपनी थीसिस को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद 1915 में मास्टर डिग्री प्राप्त की। उन्नीस सौ सौलह में उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ‘रुपये की समस्या: इसकी उत्पत्ति और इसका समाधान‘ नामक विषय की डॉक्टरेट थीसिस पर काम किया। 1920 में लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डी.एस.सी. की उपाधि प्राप्त की। जून, उन्नीस सौ सताईस में, उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। वह अपने समय के एक दुर्लभ भारतीय राजनेता थे जिन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स एवं बॉन विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था। डॉ. अम्बेडकर गरीब लोगों, दलितों के भाग्य के बारे में चिंतित थे। डॉ अंबेडकर चाहते थे कि वे स्वतंत्र हों। उन्होंने दलित वर्ग समाज की स्थापना की। उन्होंने समाज के दबे-कुचले वर्गों के मुद्दों और आकांक्षाओं को उजागर करने के लिए उन्नीस सौ सताईस में रूढ़िवादी परम्पराओं की आलोचना करने के लिए एक मराठी पाक्षिक पत्रिका मूकनायक और हिन्दू धर्म में जाति प्रथा के उन्मूलन के लिए बहिष्कृत भारत की शुरुआत की। उन्होंने अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों के खिलाफ मजबूती से खड़े होने की क्षमता और आत्मविश्वास के साथ संघर्ष के सिद्धांत और अध्ययन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और समाज के कमजोर वर्गों जैसे एस.सी., एस.टी. और ओ.बी.सी अल्पसंख्यकों व अन्य लाखों गरीब लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने।
डॉ. अम्बेडकर ने अपना जीवन दलितों की मुक्ति और सशक्तिकरण के लिए समर्पित कर दिया। इसलिए संघर्ष उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गया। उन्नीस सौ सताईस में, डॉ. अम्बेडकर ने अपने हजारों अनुयायियों के साथ महाराष्ट्र के महाड़ में चवदार टैंक से पानी पीकर एक शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने 3 मार्च, 1930 को नासिक के कालाराम मंदिर में सभी हिंदुओं के सुरक्षित प्रवेश के लिए एक आंदोलन का नेतृत्व किया। बाबा साहेब ने अंग्रेजी शासन काल में ही क्षेत्रीय विधायी विधानसभाओं और राज्यों की केंद्रीय परिषद में दलित वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान करवाया। उन्नीस सौ छत्तीस में उन्होंने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की। इसने उन्नीस सौ सैंतीस के बंबई चुनाव में तेरह आरक्षित और चार सामान्य सीटों के लिए केंद्रीय विधान सभा का चुनाव लड़ा और क्रमश: ग्यारह आरक्षित और तीन अन्य सीटों पर जीत हासिल की। उनके लिए लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोपरि थे। अपने त्याग, संघर्ष, समर्पण और कठोर मेहनत के बल पर बाबा साहेब डा0 भीम राव जी अम्बेडकर आजाद भारत के पहले कानून मंत्री बने। राज्यपाल दत्तात्रेय ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को जब देश अंग्रेजों से आजाद हुआ तो संविधान बनाने करने की चुनौती को स्वीकार करने के लिए कोई भी तैयार नहीं था। आखिर पूरे देश की नजर बाबा साहेब डा. भीम राव अम्बेडकर की तरफ गई। बाबा साहेब ने व्यक्तिगत स्तर पर प्रतिदिन 21-21 घंटे कार्य कर 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में संविधान का प्रारूप तैयार किया। इसीलिए ही बाबा साहेब को संविधान का मुख्य निर्माता माना जाता है। आजादी के समय देश विभिन्न संस्कृतियों, जातियों, धर्मों, पंथों, और सम्प्रदायों में बटा हुआ था। देश में उस समय सभी के लिए समान कानून और संविधान देना बहुत ही कठिन था, लेकिन बाबा साहेब ने समतामूलक संविधान की रचना की और देश को एक सूत्र में पिरोया। बाबा साहेब ने समाज में महिलाओं की दशा सुधारने में के लिए प्रयासरत रहे। महिला सशक्तिकरण का हिन्दू संहिता विधेयक पारित करवाने की भी कोशिश की। इसके पारित नहीं होने पर उन्होंने स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।बाबा साहेब डा0 अम्बेडकर को आयोग निर्माता भी कहा जाता है। उन्होंने निर्वाचन आयोग, योजना आयोग (नीति आयोग) वित्त आयोगों का गठन किया। राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने कहा कि डॉ. अंबेडकर में भारतीयता और राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई थी। यद्यपि डा0 भीम राव अंबेडकर दुनियाभर में घूमे थे और विदेशी धरती वाले धर्म के विभिन्न धर्मावलंबियों के प्रमुखों ने उनसे उनका मत अपनाने के लिए बहुत प्रयत्न किए। परंतु हिन्दू धर्म से नाराजगी के चलते उन्होंने किसी अन्य विदेशी धरती वाले धर्म के स्थान पर स्वदेशी बौद्ध धर्म को स्वीकार किया जो कि विशुद्ध भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है और जिसे कई सदियों से सम्पूर्ण भारतवर्ष में अशोक और हर्षवर्धन, जिनकी राजधानी हरियाणा के स्थाणैश्वर वर्तमान में थानेसर में थी, जैसे महान सम्राटों के साथ-साथ ही सामान्य जनता ने खूब स्वीकार किया था। चौदह अक्टूबर, उन्नीस सौ छप्पन को बौद्ध धर्म की उनकी स्वीकृति उनके भारतीयता और भारतीय संस्कृति के मूल्यों के प्रति अगाध प्रेम का परिचायक है। राज्यपाल ने कहा कि हमारे देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल के नेतृत्व में हरियाणा सरकार बाबा साहेब के समतामूलक समाज की संकल्पना के लिए पूरी तरह से जुटी हुई है। इसी को ध्यान में रखते हुए सबके लिए और विशेष तौर पर समाज के वंचित वर्गों के लिए आवास, राशन, शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध करवाने के लिए अनेकों कार्यक्रम और योजनाएं चलाई जा रही हैं। आज गरीब समाज को डॉ भीमराव अम्बेडकर के बताए मार्ग पर चलने की आवश्यकता है। उनका दर्शन, चिंतन और सिद्धांत युगों-युगों तक हम सबको प्रेरित करता रहेगा। उनके जीवन दर्शन को अपनाकर ही हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि जब वे 1977 में जेल मेंं गए तो बााबा साहेब की लिखित किताब को पढक़र निर्णय लिया कि वे उनके आदर्शों पर ही चलेंगे और आज वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं।

इस अवसर पर अधिकारीगण तथा बड़ी संख्या में गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे, जिनमें विशेष रूप से सांसद रमेश कौशिक, राई विधायक मोहनलाल बड़ौली, गन्नौर विधायक निर्मल चौधरी, कुलपति डॉ० राजेन्द्र कुमार अनायत, रजिस्ट्रार डॉ० सुरेश कुमार, एसडीएम राकेश संधू, तीर्थ राणा, ललित बतरा, राजीव जैन, जसबीर दोदवा, आजाद सिंह नेहरा, रविंद्र दिलावर, राकेश मलिक, किरणबाला, प्रदीप गौतम, अशोक छाबड़ा, भूपेंद्र गहलावत, डा. पूर्णमल गौड़, प्रीतम खोखर, सुनीता लोहचब, राजीव गुप्ता, सुरेश पाराशर आदि शामिल थे।

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