April 3, 2026

म्यांमार में तख्तापलट करने वाले जनरल ह्लाइंग अब बने राष्ट्रपति

नेपीडॉ, म्यांमार में सैन्य शासन ने सत्ता पर अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करते हुए इसे एक औपचारिक और संवैधानिक रूप दे दिया है। साल 2021 में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का तख्तापलट करने वाले सीनियर जनरल मिन आंग ह्लाइंग अब आधिकारिक तौर पर म्यांमार के नए राष्ट्रपति बन गए हैं। शुक्रवार को सैन्य-समर्थित संसद में हुए एक एकतरफा मतदान में उन्होंने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया। इस जीत के साथ ही देश की कमान अब पूरी तरह और कानूनी तौर पर उनके हाथों में आ गई है, जिसे जानकारों द्वारा तानाशाही को लोकतंत्र के चोले में छिपाने की एक कोशिश माना जा रहा है।

69 वर्षीय मिन आंग ह्लाइंग की यह जीत पहले से ही तय मानी जा रही थी, क्योंकि म्यांमार की वर्तमान संसद में पूरी तरह सेना का वर्चस्व है। कुल 584 मतों में से उन्हें 293 वोट मिले, जो जीत के लिए जरूरी जादुई आंकड़े से अधिक थे। म्यांमार के विवादित संविधान के अनुसार, संसद की एक-चौथाई सीटें बिना किसी चुनाव के सीधे सैन्य अधिकारियों के लिए आरक्षित रहती हैं। ऐसे में किसी भी नागरिक पार्टी के लिए सेना की मर्जी के बिना सरकार बनाना या सत्ता में आना लगभग नामुमकिन है। हाल ही में हुए चुनावों में भी सेना समर्थित ‘यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी’ (USDP) ने 80% से अधिक सीटों पर कब्जा जमाया था, जिसे पश्चिमी देशों ने एक ‘चुनावी ढोंग’ करार दिया है।

फरवरी 2021 में नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की चुनी हुई सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद से ही जनरल ह्लाइंग देश के सर्वेसर्वा बने हुए थे। राष्ट्रपति बनने से ठीक पहले उन्होंने सेना में एक बड़ा और रणनीतिक फेरबदल किया। उन्होंने अपने सबसे वफादार और पूर्व खुफिया प्रमुख ‘ये विन ओ’ को नया सेना प्रमुख नियुक्त किया है। इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने के बाद भी सेना की ताकत और उस पर उनका नियंत्रण कम न हो। जनरल ह्लाइंग का यह कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सरकार को ‘वैध’ दिखाने की एक कूटनीतिक चाल मानी जा रही है।

भले ही राजधानी नेपीडॉ के भीतर जनरल ह्लाइंग ने सत्ता का औपचारिक अभिषेक करा लिया हो, लेकिन देश के जमीनी हालात अब भी बदतर हैं। म्यांमार का एक बड़ा हिस्सा आज भी भीषण गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है। इसी हफ्ते आंग सान सू की की पार्टी के बचे हुए नेताओं और जातीय अल्पसंख्यक सेनाओं ने हाथ मिलाकर एक नया ‘संयुक्त मोर्चा’ तैयार किया है। इस गठबंधन ने सोमवार को एक कड़ा बयान जारी करते हुए संकल्प लिया है कि उनका अंतिम उद्देश्य सैन्य तानाशाही को जड़ से खत्म कर एक नया राजनीतिक ढांचा खड़ा करना है।

अब जबकि ह्लाइंग आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति बन चुके हैं, चीन और आसियान जैसे पड़ोसी देश उनके साथ संबंधों को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर सकते हैं। इससे विद्रोही समूहों पर सैन्य और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, देश के भीतर चल रहा सशस्त्र संघर्ष, चरमराई अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध जनरल ह्लाइंग के राष्ट्रपति कार्यकाल के लिए कांटों भरी राह साबित होने वाले हैं। म्यांमार की जनता के लिए यह बदलाव सत्ता का केंद्र बदलने जैसा है, जहां सेना पिछले छह दशकों में से पांच दशक तक सीधे तौर पर शासन करती रही है।

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