केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने भी चुना सत्याग्रह का रास्ता
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लिखी चिट्ठी
नई दिल्ली, आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर साफ कर दिया है कि वह अपने केस की आगे की सुनवाई में हिस्सा नहीं लेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में उनकी अंतरात्मा उन्हें इस मामले में भाग लेने की अनुमति नहीं देती। अपने एक्स पोस्ट में सिसोदिया ने लिखा कि यह किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था में भरोसे का सवाल है। हर नागरिक को न केवल निष्पक्ष न्याय मिलना चाहिए, बल्कि वह निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका न्यायपालिका और संविधान पर पूरा भरोसा है, लेकिन जब मन में गंभीर संदेह हो तो औपचारिक रूप से शामिल रहना सही नहीं लगता। इसी कारण उन्होंने ‘सत्याग्रह’ का रास्ता चुना है।
अपने पत्र में सिसोदिया ने बताया कि यह कदम उन्होंने काफी सोच-विचार के बाद उठाया है और यह किसी भी तरह से अदालत या न्यायाधीश के प्रति असम्मान नहीं है। 27 अप्रैल को अरविंद केजरीवाल ने भी इसी मामले में एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने आगे की कार्यवाही में शामिल होने से इनकार किया था। मनीष सिसोदिया ने कहा कि उन्होंने उस पत्र को ध्यान से पढ़ा और उसमें उठाए गए मुद्दों से सहमति जताई।
पत्र में मनीष सिसोदिया ने दो मुख्य चिंताओं का जिक्र किया। पहला, जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद जैसे संगठन के कार्यक्रमों में सार्वजनिक रूप से शामिल होना। दूसरा, उनके बच्चों का केंद्र सरकार के विभिन्न पैनलों में पेशेवर रूप से जुड़े होना। सिसोदिया ने लिखा कि इससे यह धारणा बनती है कि कानून अधिकारियों की विरोधी पक्ष से नजदीकी हो सकती है।
उन्होंने यह भी जिक्र किया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की भूमिका भी इस संदर्भ में है, क्योंकि सिसोदिया के अनुसार जज के बच्चों के पेशेवर मामलों में उनका प्रभाव बताया गया है।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके इस फैसले से उन्हें कानूनी नुकसान हो सकता है, लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांत को अपनाने की बात कही और कहा कि कभी-कभी व्यक्ति को सुविधा और अंतरात्मा के बीच चुनाव करना पड़ता है।
सिसोदिया ने स्पष्ट किया कि उनका यह निर्णय केवल इस विशेष मामले तक सीमित है और इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें पूरी न्यायपालिका पर अविश्वास है। उन्होंने कहा कि उनका संविधान और अदालतों पर भरोसा अटूट है, लेकिन इस मामले में परिस्थितियां अलग हैं।
