हाथरस हादसे से सबक लें प्रशासन व श्रद्धालु
विश्व के लगभग सभी देशों में धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। ऐसे आयोजनों में श्रद्धालुओं के आने- जाने, बैठने आदि की उचित व्यवस्था की जाती है। भारत में परिस्थितियों थोड़ी अलग है। यहां धार्मिक आयोजन तो होते हैं लेकिन आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा व्यवस्था को आयोजकों या प्रशासन द्वारा गंभीरता से नहीं लिया जाता। फलस्वरूप अनेकों बार धार्मिक आयोजनों में भगदड़ मचने या अन्य कारणों से दुर्घटनाएं होती है व बड़ी संख्या में लोगों को जान से हाथ धोना पड़ता है।
भारतीय जनमानस में धर्म के प्रति गहरी आस्था होने के कारण यहां हर धर्म के अधिकतर कथावाचकों ने स्वयं को धर्मगुरू घोषित किया हुआ है व उनके प्रवचन सुनने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके आयोजनों में अपनी जान जोखिम में डालकर लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। हालांकि अनेकों धर्मगुरू, कथावाचक या कथित ईश्वर के प्रतिनिधि अपने अनैतिक या आपराधिक कृत्यों के कारण कानून के शिकंजे में है लेकिन उनके श्रद्धालुओं की संख्या वैसे ही बरकरार है।
पिछले दिनों हाथरस में एक धार्मिक समागम में मची भगदड़ के कारण 122 लोग मारे गए। इनमें से अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। इस तरह के हादसे एक लंबे समय से होते चले आ रहे हैं लेकिन उनकी रोकथाम के लिए ठोस उपाय नहीं किया जा रहे हैं। धार्मिक आयोजनों में बड़ी आसानी से भारी भीड़ एकत्रित हो जाती है। हालांकि धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने वाले और साथ ही कथावाचक अथवा संत महात्मा उनमें अच्छा खासा धन जुटाने में सफल रहते हैं लेकिन वे श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए कोई विशेष प्रबंध नहीं करते। इस कार्यक्रम में भी भगदड़ इसलिए मची क्योंकि बड़ी संख्या में एकत्रित श्रद्धालु कथित धर्म गुरू या कथा वाचक साकार विश्व हरि के दर्शन के लिए उनके पास जाने के लिए धक्का मुक्की करने लगे थे।
स्वयं को संत महात्मा कहाने वाले साकार विश्व हरि जैसे लोग अपने भक्तों का प्रयोग स्वयं के महिमा मंडल करने और धन एकत्रित करने में करते हैं। ऐसे संत महात्माओं का अपने अनुयायियों के आत्मिक उत्थान से कोई लेना देना नहीं होता। आमतौर पर वे उन्हें झूठी दिलासा देते हैं और अंधविश्वासी ही बनाते हैं। कुछ धर्मगुरू या कथा वाचक तो स्वयं को ईश्वरीय या अलौकिक शक्तियों से लैस करार देते हैं। निर्धन और अशिक्षित लोग उनकी बातों में आ जाते हैं। फलस्वरूप धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ती जाती है और इसी के साथ उनके अनुयायियों की संख्या भी लाखों- करोड़ों में पहुंच जाती है।
ऐसे कथा वाचक धर्म-कर्म, ईश्वर आदि की अपनी तरह से व्याख्या करके लोगों को आकर्षित करने और उन्हें अपना अनुयायी बनाने में सफल हो जाते हैं। यह अनुयायी आसानी से अंधविश्वास से ग्रस्त हो जाते हैं और कथावाचक या कथित संत के प्रति उनकी आस्था इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वे सही गलत का भेद करना छोड़ देते हैं। यदि कोई कथावाचक या स्वयं को संत महात्मा कहाने वाला व्यक्ति भारी भीड़ जुटाने में समर्थ हो जाता है तो नेतागण वोट बैंक बनाने के लालच में उसे समर्थन और संरक्षण देने लगते हैं। यह समर्थन और संरक्षण ऐसे लोगों के साम्राज्य को बढ़ाने का काम करता है।
धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आयोजनों में लोगों को जाने से रोक नहीं जा सकता लेकिन कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि इस तरह की आयोजनों में सुरक्षा के ठोस उपाय किए जाएं। ऐसे बाबाओं, कथा वाचकों या धर्म गुरूओं के प्रवचन सुनने या उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से किसी के जीवन में क्या सुधार हुआ होगा यह विचारणीय प्रश्न है लेकिन क्योंकि यह लोगों की आस्था का विषय है ऐसे में कोई टिप्पणी उचित नहीं है। लेकिन लोगों को समझना चाहिए कि ईश्वर या ईश्वरीय शक्तियां किसी के बस में नहीं है व दूसरों के जीवन को सुधारने का दावा करने वाले बाबा या धर्मगुरू भक्तों के माध्यम से अपना ही जीवन सुधारते हैं।
