कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की ओर से जारी दिशा निर्देशानुसार एवं जिला एवं सत्र न्यायाधीश नरेन्द्र सूरा के मार्गदर्शन में आज जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव एवं मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी शैलजा गुप्ता की देखरेख में एडीआर सेंटर में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया।
इस मौके पर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश वर्षा जैन, अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ललिता पटवर्धन ने संयुक्त रूप से अधिनियम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013, भारत सरकार की ओर से कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न का सामना किए जाने वाले मुद्दे को हल करने के लिए बनाया गया एक कानून है। इस अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल कार्य वातावरण बनाना तथा उन्हें यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करना है। अधिनियम यौन उत्पीड़न को परिभाषित करता है जिसमें शारीरिक संपर्क और यौन प्रस्ताव, यौन अनुग्रह के लिए मांग या अनुरोध, अश्लील टिप्पणी करना, अश्लील चित्र दिखाना तथा किसी भी अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक व्यवहार जैसे अवांछित कार्य शामिल हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने विशाखा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य 1997 मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय में ‘विशाखा दिशा-निर्देश’ जारी किए। इन दिशा-निर्देशों में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (“यौन उत्पीड़न अधिनियम”) को आधार बनाया।
उन्होंने बताया कि यह अधिनियम कार्यस्थल में यौन उत्पीड़न को रोकने और प्रतिबंधित करने के लिए नियोक्ताओं पर कानूनी दायित्व डालता है व यौन उत्पीड़न की शिकायतें प्राप्त करने और उनका समाधान करने के लिए नियोक्ताओं को 10 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रत्येक कार्यस्थल पर एक आंतरिक शिकायत समिति का गठन करना आवश्यक है। सभी कर्मचारियों को जिला न्यायालय व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण नारनौल में गठित आंतरिक शिकायत समिति की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी दी।
इस मौके पर पैनल अधिवक्ता गिरिबाला यादव ने भी अधिनियम के बारे में जानकारी दी।
