February 25, 2026

नारी को सवालों के कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है?

“अब नारी झुकेगी नहीं, दौर बदलेगा!”

आज की महिला सिर्फ़ सपने देखने तक सीमित नहीं है, वह उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत भी कर रही है। वह घर भी चला रही है और ऑफिस भी, कमर्शियल बस/ट्रक/टैक्सी तक चला रही है, खेतों में हल भी चला रही है और बुलंदियों का कारोबार भी। लेकिन क्या हमारा समाज किसी भी महिला की इस मेहनत भरी उपलब्धि को पूरी तरह स्वीकार कर पाया है? अगर वह अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से जीना चाहती है, तो उसे समाज द्वारा सवालों के कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है? जब कोई लड़की अपने लिए करियर चुनती है, तो पूछा जाता है—“शादी कब करोगी?” जब कोई महिला प्रमोशन पाती है, तो कानाफूसी होती है,—“जरूर किसी की सिफारिश होगी” और अगर कोई महिला अपने हक़ की आवाज़ उठाती है, तो उसे “बागी”, “असभ्य” या “ज्यादा बोलने वाली” करार दिया जाता है। आखिर क्यों?
समाज के हर वर्ग की महिलाओं की अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। गाँवों में आज भी लड़कियाँ स्कूल छोड़ने को मजबूर होती हैं क्योंकि या तो स्कूल दूर है या परिवार को लगता है कि पढ़ाई उनके लिए ज़रूरी नहीं। कामकाजी महिलाओं को आज भी ‘अच्छी माँ’, अच्छी पत्नी और ‘बेहतरीन प्रोफेशनल कार्य’ के बीच संतुलन बिठाने की जद्दोजहद करनी पड़ती है। घर में रहकर परिवार संभालने वाली महिलाओं का योगदान आर्थिक रूप से गिना ही नहीं जाता। और जब बात दिहाड़ी मजदूर या घरेलू कामगार महिलाओं की आती है, तो वे अब भी बुनियादी अधिकारों और सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रही हैं।
तकनीक और सोशल मीडिया के इस दौर में नई तरह की समस्याएँ भी खड़ी हो रही हैं। इंटरनेट की ताकत जहाँ एक तरफ़ महिलाओं को जागरूक बना रही है, वहीं दूसरी ओर यह उन्हें ट्रोलिंग, साइबर अपराध और मानसिक उत्पीड़न का शिकार भी बना रही है। छोटे बच्चे, ख़ासकर गाँवों और छोटे शहरों में, सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों के शिकार हो रहे हैं—रील्स और वायरल ट्रेंड्स ने उनकी शिक्षा और नैतिक मूल्यों को काफी प्रभावित किया है। क्या यह चिंता का विषय नहीं है कि हमारा समाज ज्ञान और हुनर की जगह दिखावे और लाइक्स को प्राथमिकता देने लगा है? हमें यह समझना होगा कि असली नारी सशक्तिकरण तभी आएगा जब हमारी लड़कियाँ डिजिटल रूप से भी जागरूक होंगी, सही और गलत में फर्क समझ सकें, और आत्मनिर्भर बनने के लिए तकनीक का सही उपयोग कर सकें।
लेकिन बदलाव आ रहा है। बेटियाँ अब केवल संघर्ष नहीं कर रहीं, वे जीत का परचम भी लहरा रही हैं। वे अब अपनी पहचान किसी की बेटी, पत्नी या माँ के रूप में नहीं, बल्कि खुद के नाम से बना रही हैं। अब वे “दया” की नहीं, अधिकारों की माँग कर रही हैं। अब वे सिर्फ़ “सुरक्षा” ही नहीं, सत्ता में, समाज मे भागीदारी भी चाहती हैं। अब उन्हें कोई “संभालने” की नहीं, अवसर देने की जरूरत है।

सरकार की योजनाएँ:-
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “उज्ज्वला योजना”, “मुद्रा योजना”, “महिला स्वयं सहायता समूह”—महिलाओं को सशक्त बना रही हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब हर गाँव, हर शहर और हर गली में यह सोच बदले कि “लड़की बोझ नहीं, बराबर की हक़दार है।” एक प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते मेरी यह ज़िम्मेदारी है कि महिलाओं तक उनके हक़ पहुँचें—चाहे वह भूमि के मालिकाना हक़ की बात हो, न्याय की, या स्वरोज़गार की। किसी भी महिला को सिर्फ इसलिए अपने अधिकार से वंचित न रहना पड़े क्योंकि उसे जानकारी नहीं है या सिस्टम की जटिलताओं की वजह से वह पीछे रह जाती है।
इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मेरा सभी से एक ही आग्रह है—हम केवल नारों तक सीमित न रहें, बल्कि यह सुनिश्चित करें कि हर घर, हर स्कूल, हर ऑफिस, और हर पंचायत में यह बदलाव महसूस हो। महिलाओं को सिर्फ़ “सम्मान” देना ही काफी नहीं, उन्हें बराबरी का हक़ मिले, निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले, और अपने जीवन को अपने तरीके से जीने की आज़ादी मिले।
अब नारी झुकेगी नहीं, अब दौर बदलेगा। यह बदलाव हर परिवार से, हर दफ्तर से, हर गाँव-शहर से शुरू होगा। हम सभी को यह सुनिश्चित करना होगा कि अगली पीढ़ी की लड़कियों को वह समाज मिले, जहाँ वे खुलकर हँस सकें, निर्भीक होकर आगे बढ़ सकें, और बिना किसी संकोच के अपने निर्णय ले सकें। क्योंकि जब एक नारी आगे बढ़ती है, तो पूरा समाज, पूरा देश, और पूरी दुनिया उसके साथ आगे बढ़ती है।
प्रस्तुति: राधिका सैनी, तहसीलदार, नूरपुर

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