राजनीतिक पार्टियों के प्रलोभन के जाल में फंसते मतदाता
देश की चुनावी व्यवस्था मतदाताओं को प्रलोभित कर मत हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। हालांकि इस पर सुप्रीम कोर्ट बार-बार चिंता प्रकट कर रहा है साथ ही चुनाव आयोग भी राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान मतदाताओं को रिझाने के लिए मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात करता आ रहा है। लेकिन राजनीतिक दल एक दूसरे से बढ़-चढ़कर मतदाताओं को प्रलोभित करने में लगे हुए हैं। राजनीतिक दलों द्वारा किया जा रहा यह अनैतिक कृत्य जहां स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है वहीं देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित करने के साथ-साथ विकास के रथ को भी आगे बढ़ने में अड़चन पैदा करता है।
अगर राजनीतिक दल यह सब कर रहे हैं तो इसके लिए देश की जनता भी बराबर की दोषी है जो मुफ्त की रेवड़ियां देख कर ही मतदान करती है। अगर मतदाता मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की घोषणा करने वाले राजनीतिक दलों के साथ खड़े न हों तो शायद राजनीतिक दल चुनावों में देश की उन्नति की योजनाएं जनता के सामने रखने के लिए मजबूर होंगे।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान हो चुका है। अब केवल तेलंगाना में मतदान होना शेष है। इन राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान यह बात उभर कर सामने आई है कि मतदाता राजनीतिक दलों के प्रलोभन का शिकार बनने के लिए तैयार है। आमतौर पर मतदाता राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में यह नहीं देखते कि उनमें अच्छी शिक्षा, नागरिक सुविधा, बिजली, पानी, स्वास्थ्य व्यवस्था आदि के वादे किए गए हैं या नहीं। वह अब यह देखता है कि किस दल ने उन्हें क्या-क्या मुफ्त वस्तुएं और सुविधाएं देने के वादे किए हैं। इससे भी खराब बात यह है कि ऐसे मतदाता न तो प्रत्याशी की छवि पर गौर करते हैं और न ही उसके दल की नीतियों पर चिंतन करते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ यह देखते हैं कि उन्हें मुफ्त में क्या-क्या मिलने वाला है।
समस्या केवल यही नहीं है कि राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए आर्थिक नियमों की अनदेखी करके वेहिसाब लोक लुभावनी घोषणाएं कर रहे हैं बल्कि यह भी है कि वह उन्हें गुपचुप रूप से तरह-तरह की सामग्री और पैसे देकर उनके वोट ख़रीदने की कोशिश भी कर रहे हैं। यह प्रवृत्ति इसलिए बढ़ती जा रही है क्योंकि औसत मतदाता चंद पैसे और मुफ्त की वस्तुओं या सुविधाओं की एवज में अपना वोट बेचने के लिए तैयार रहते हैं। चुनाव आयोग की तमाम कोशिशों के बाद भी मतदाताओं को बांटने के लिए अनेक प्रकार की सामग्री और नगदी का एक बड़ा हिस्सा उन तक गुपचुप रूप से पहुंचा दिया जाता है।
यह देखना दुखद है कि जो राजनीति एक समय समाज सेवा थी वह अब एक व्यवसाय बन चुकी है। इसलिए राजनीति में ऐसे लोग अधिक आ रहे हैं जिनका उद्देश्य किसी भी प्रकार धन अर्जित करना होता है। एक समय चुनावों में बाहुबल की बड़ी भूमिका होती थी। अब उसका स्थान धन बल ने ले लिया है। मतदाताओं को यह समझना होगा कि यह राजनीतिक मुफ्त खोरी की संस्कृति देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क करने और उसके साथ-साथ देश के भविष्य को चौपट करने वाली है। अभी भी वक्त है कि मतदाता अपनी जिम्मेवारी समझें व राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त खोरी की आदत को बढ़ाने वाली संस्कृति पर रोक लगाने के लिए ऐसे दलों का बहिष्कार करें और देश में स्वस्थ चुनावी प्रक्रिया की दिशा में आगे बढ़ें।
