संसद में सांसदों के आचरण पर सख्त कानून की जरूरत
विपक्षी दलों द्वारा संसद में गतिरोध बनाए रखने की परंपरा पिछले काफी अर्से से निभाई जा रही है। मोदी सरकार के सत्ता संभालने के उपरांत विपक्षी दलों के सांसदों द्वारा संसद में गतिरोध पैदा करने के घटनाक्रम पहले की तुलना में काफी ज्यादा ही हो रहे हैं। शायद विपक्षी दलों को लगता है कि ऐसा करने से सत्तापक्ष की किरकिरी होगी व आम जनता में सरकार के प्रति विश्वास में कमी आएगी। हैरानी की बात है कि जिस मंच पर देश की गंभीर समस्याओं पर चर्चा या बहस होनी है, आवश्यक विधेयक पारित होने हैं, वहां कोई न कोई बहाना बनाकर बहस से बचने का मार्ग ढूंढ लिया जाता है। हर रोज देशवासियों के करोड़ों रुपए इस राजनीतिक ड्रामेबाजी में स्वाहा कर दिए जाते है। मानसून सत्र भी ऐसे ही राजनीतिक नाटक की भेंट चढ़ने जा रहा है। विपक्षी दल मणिपुर हिंसा को लेकर बहस चाहते हैं लेकिन वे इस बात पर अड़े हैं कि इस विषय पर पहले प्रधानमंत्री बयान दें। गृह मंत्री जो की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है उनका बयान सुनने के लिए विपक्ष तैयार नहीं है। मणिपुर घटनाक्रम से समूचा देश शर्मसार है व हर कोई चाहता है कि वहां शीघ्र शांति स्थापित हो। लेकिन इस मुद्दे पर चर्चा करने से बचने के लिए प्रमुख विपक्षी दल कभी प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग कर रहे हैं तो कभी अविश्वास प्रस्ताव लाकर मूल मुद्दे से ध्यान हटा कर राजनीतिक विषय पर सबका ध्यान केंद्रित करने की कोशिश कर रहे हैं। समय की मांग तो यही थी कि इस घटना पर संसद में तत्काल गहन चर्चा होती व सरकार की खामियों को उजागर करते हुए वहां शांति स्थापित करने का मार्ग निकाला जाता। हालांकि मणिपुर के शर्मनाक वीडियो सामने आते ही प्रधानमंत्री ने मीडिया के सामने आकर घटना की भर्त्सना करते हुए यह कहा था कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन विपक्ष इससे संतुष्ट नहीं है व इस बात पर अड़ा है कि संसद में मणिपुर पर चर्चा तब होने दी जाएगी जब पहले प्रधानमंत्री अपना बयान देंगे। इसे लेकर भी पक्ष विपक्ष में टकराव चल रहा है कि मणिपुर पर बहस किस नियम के तहत हो। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में मणिपुर पर चर्चा शुरू करने की कोशिश की लेकिन विपक्ष ने अपने हंगामे से उसे नाकाम कर दिया। साफ है कि विपक्ष को संसद ठप करने का बहाना चाहिए था। विपक्ष सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी लेकर आया जिसे मंजूरी भी मिल गई और यह भी तय हो गया कि जल्द ही उस पर बहस होगी। इसके बाद भी संसद नहीं चलने दी जा रही है और विपक्ष हंगामा करने को ही प्राथमिकता दे रहा है। पिछले काफी समय से यह देखने को मिल रहा है कि संसद का प्रत्येक सत्र शुरू होते ही विपक्ष किसी न किसी मुद्दे पर हंगामा शुरू कर देता है और सदन चलने नहीं देता। विपक्षी दलों को यह आभास होना चाहिए कि जनता यह अच्छे से देख और समझ रही है कि वे किसी न किसी बहाने संसद को नहीं चलने देना चाहते। संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा करने या वहां हंगामा करने से किसी भी राजनीतिक दल की आम जनता में लोकप्रियता नहीं बढ़ जाती। विपक्षी दल संसद में अपने तर्कों पर आधारित बहस से ही लोगों के मन में स्थान बना सकते हैं। अब समय आ गया है कि संसद में सांसदों के आचरण को लेकर भी कठोर नियम- कानून बनाए जाएं ताकि भारत की संसद को दुनिया भर के सामने मजाक बनने से बचाया जा सके। ऐसे नियम- कानून बनाए जाएं कि जनता के प्रतिनिधि संसद में वही कार्य कर सकें जिनके लिए उन्हें वहां भेजा गया है। – पीयूष सिंगला
