आंतरिक कृपा प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण गुरु शिष्य पर करते हैं: साध्वी सुश्री कंचन मुक्ता
संजीव डोगरा, दौलतपुर चौक, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा बिधिपुर आश्रम में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। सत्संग के अंतर्गत श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री कंचन मुक्ता भारती ने प्रभु जिज्ञासुओं को बताया कि कृपा दो प्रकार की होती है, बाहरी कृपा और आंतरिक कृपा। बाहरी कृपा हमें प्रत्यक्ष रूप से दिखती है पर आंतरिक कृपा प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण गुरु शिष्य पर करते हैं जो बाहर से शिष्य को नहीं दिखती। किंतु यह कृपा उसके कई जन्मों के संस्कारों की धार को कुंठित कर देती है। बाहरी कृपा बहुत शीघ्र घटित हो जाती है अर्थात इसका फल तुरंत दृष्टिगोचर हो जाता है पर आंतरिक कृपा का परिणाम धीरे-धीरे प्रकट होता है।
इसलिए गुरु से बाहरी कृपा की मांग कभी मत करना केवल आंतरिक कृपा की प्रार्थना करना क्योंकि जब आंतरिक कृपा होती है तो बाहरी कृपा अपने आप ही हो जाती है फिर उसके लिए कोई विशेष आग्रह नहीं करना पड़ता। बाहरी कृपा से आपको संसार की कोई विशेष उपलब्धि जरूर मिल सकती है परंतु आंतरिक कृपा से वह मिलता है जो गुरु हमें देना चाहते हैं, जो गुरु हमारे लिए उपयुक्त समझता है। इसलिए सदैव आंतरिक कृपा होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। आंतरिक कृपा एक पूर्ण गुरु द्वारा ही संभव है। शास्त्र कहते हैं, जब तक जीवन में सच्चा गुरु नहीं आता तब तक एक साधक का आंतरिक उत्थान नहीं हो सकता है। इसलिए मनुष्य जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन में एक पूर्ण सद्गुरु की आवश्यकता है जो आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन करवा कर जीवन को सफल बनाते हैं। और एक मनुष्य यदि आंतरिक उत्थान के लिए जीवन का वास्तविक तत्व यानी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, तो एक सच्चे सतगुरु की शरण में जाना होगा। वह हमारा दिव्य नेत्र खोलकर हमें ब्रह्मधाम तक ले जा सकते हैं। जहां मुक्ति और आनंद का साम्राज्य है जो पूर्ण गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। इसलिए ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सद्गुरु संसार और शाश्वत के बीच सेतु का काम करते हैं, क्षणभंगुरता से स्थायित्व की ओर ले जाते हैं।
