ट्रम्प की वापसी के साथ भारत के लिए नए अवसर
अमेरिका के इतिहास में सबसे बड़ी सियासी वापसी करते हुए डोनाल्ड ट्रम्प दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं। अमेरिका में 131 साल बाद कोई राष्ट्रपति एक चुनाव हारने के बाद दोबारा जीता है। 1893 में ग्रोवर क्लीवलैंड हारने के बाद जीतने वाले राष्ट्रपति बने थे। प्रचार के दौरान दो जानलेवा हमलों में बाल-बाल बचे 78 वर्षीय ट्रम्प अमेरिकी इतिहास के सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति हैं। बुधवार शाम तक उन्हें 292 इलेक्टोरल वोट मिल गए, जबकि जीत के लिए 270 सीटें जरूरी हैं। डेमोक्रेट उम्मीदवार कमला हैरिस को 224 सीटें मिली हैं। वे सातों स्विंग स्टेट में हार गई । अंतिम परिणाम आने में हफ्तेभर लग सकता है।
फ्लोरिडा में ट्रम्प ने विक्ट्री स्पीच में ‘अमेरिका के स्वर्णिम युग’ की वापसी का वादा दोहराया। वही, ट्रम्प पूरे चुनाव में अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर आक्रामक रहे। वैश्विक अनिश्चितता ओर महंगाई से हताश लोगों को साहसिक वादों से प्रभावित किया। यही कारण है कि मतदाताओं ने स्वर्णिम अमेरिका के लिए ‘सुपर पॉवर’ ट्रम्प को राष्ट्रपति चुना। ट्रम्प ने ओहियो के सीनेटर जेडी वेंस को अपना रनिंग मेट चुना था। ऐसे में वेंस अब उपराष्ट्रपति होंगे। वेंस का भी भारत से जुड़ाव है। उनकी पत्नी उषा चिलुकुरी वेंस मूल रूप से आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले की हैं।
डोनाल्ड ट्रम्प एक व्यवसायी रियल एस्टेट कारोबारी और रियलिटी टी.वी. स्टार से लेकर अमरीका के इतिहास में पहले ऐसे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जिन्हें अपराधी भी घोषित किया गया है। ट्रम्प की ऐतिहासिक वापसी का एक कारण यह भी है कि राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान ट्रम्प पर दो बार उनकी हत्या का प्रयास हुआ लेकिन वह चुनाव मैदान में मजबूती से डटे रहे।
ट्रम्प का पुन: राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद भारत के साथ उनके संबंधों को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए नए अवसर खुलेेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोस्ती का भारत-अमेरिका संबंधों पर सकारात्मक असर पड़ेगा। हालांकि, भारत को आपसी हित के क्षेत्रों में सहयोग बनाए रखने के लिए अपनी रणनीतियों को बदलना पड़ सकता है। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए एक नया अवसर हो सकता है। ट्रंप उन देशों पर शुल्क और आयात प्रतिबंध लगाएंगे, जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वे अमेरिका के अनुकूल नहीं हैं। इनमें चीन और यहां तक कुछ यूरोपीय देश शामिल हैं।
अगर ऐसा हुआ तो इससे भारतीय निर्यात के लिए बाजार खुल सकते हैं। बार्कलेज ने बुधवार को एक शोध रपट में कहा कि व्यापार नीति के लिहाज से ट्रंप एशिया के लिए सबसे अधिक अहम हो सकते हैं। बार्कलेज ने कहा कि हमारा अनुमान है कि ट्रंप के शुल्क प्रस्ताव चीन के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में दो फीसद की कमी लाएंगे और क्षेत्र की बाकी अधिक खुली अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डालेंगे। इसमें कहा गया कि भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस सहित ऐसी अर्थव्यवस्थाएं उच्च शुल्क के प्रति कम संवेदनशील होंगी, जो घरेलू बाजार पर अधिक निर्भर हैं। कुमार ने कहा कि ट्रंप भारत को एक मित्र देश के रूप में देखेंगे और उनके रहते भारत में अमेरिकी कंपनियों के बड़े निवेश की उम्मीद की जा सकती है। उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर ट्रंप की जीत भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही सकारात्मक घटना है । मद्रास स्कूल आफ इकनामिक्स के निदेशक एनआर भानुमूर्ति ने कहा कि मुझे संदेह है कि ट्रंप भारतीय उत्पादों पर शुल्क लगाएंगे, क्योंकि अमेरिका के लिए चिंता भारत को लेकर नहीं, बल्कि चीन के बारे में अधिक है। दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के व्यापार संरक्षणवादी विचारों का भारत के निर्यात पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावना के बीच यदि नया अमेरिकी प्रशासन ‘अमेरिका प्रथम’ एजेंडा को आगे बढ़ाने का फैसला करता है, तो भारतीय निर्यातकों को वाहन, कपड़ा और फार्मा जैसे सामान के लिए ऊंचे सीमा शुल्क का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने यह राय जताई है। विशेषज्ञों ने कहा कि ट्रंप एच-1बी वीजा नियमों को भी सख्त कर सकते हैं, जिससे भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों की लागत और वृद्धि पर असर पड़ेगा। भारत में 80 फीसद से अधिक आइटी निर्यात आय अमेरिका से आती है, जिससे वीजा नीतियों में बदलाव के प्रति भारत संवेदनशील हो जाता है। अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। अमेरिका से भारत का वार्षिक कारोबार 190 अरब डालर से अधिक है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि ट्रंप चीन के बाद अब भारत और अन्य देशों पर भी शुल्क लगा सकते हैं। ट्रंप ने पहले भारत को ‘बड़ा शुल्क दुरुपयोगकर्ता’ कहा था और अक्टूबर, 2020 में भारत को ‘टैरिफ किंग’ करार दिया था। उन्होंने कहा कि इन टिप्पणियों से पता चलता है कि ट्रंप का दूसरा कार्यकाल कठिन व्यापार वार्ता ला सकता है। श्रीवास्तव ने कहा कि उनका अमेरिका प्रथम एजेंडा संभवत: सुरक्षात्मक उपायों पर जोर देगा।
भारत के ईरान संबंधों को लेकर ट्रम्प को आपत्ति है इसलिए भारत को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। पाकिस्तान की आलोचना ट्रम्प सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं। पहले दौर में पाकिस्तान की सैनिक सहायता भी बंद कर दी थी जिसको जो बाइडेन ने दोबारा शुरू कर दी थी। बांग्लादेश के मामले में भी ट्रम्प का रुख बाइडेन से अलग है। वहां हिन्दुओं की सुरक्षा का मुद्दा चुनावों के दौरान भी उठाया था। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि बाइडेन सरकार से कहीं बेहतर रिश्ते भारत के साथ ट्रम्प सरकार के होंगे।
