राजनीतिक दलों की राजनीति का शिकार बनने से बचें किसान नेता
फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी कानून व अन्य ढेर सारी मांगों को लेकर दिल्ली घेरने को आमादा पंजाब के किसानों को कांग्रेस व आम आदमी पार्टी खुलकर समर्थन दे रही है। इसे राजनीतिक बेशर्मी की हद ही कहा जा सकता है कि जिस स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को कांग्रेस पार्टी की सरकार ने 2010 में खारिज कर दिया था उसके नेता आज उसे लागू करने के वादे कर रहे हैं। कांग्रेस के शीर्ष नेता वादा कर रहे हैं कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो एमएसपी पर फसल खरीद का कानून बनाएंगे। इन नेताओं को अगर राजनीतिक मर्यादा का जरा भी ख्याल है तो इन्हें यह भी बताना चाहिए की 2010 में उनकी पार्टी की सरकार ने स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू करने से इनकार कर दिया था। यही हाल आम आदमी पार्टी का भी है। पंजाब में पार्टी की सरकार बनने से पहले तत्कालीन सांसद व वर्तमान मुख्यमंत्री भगवंत मान तथा उनके अन्य वक्ता, नेता अनेकों मंचों से यह वादा करते थे कि पंजाब में उनकी सरकार बनने पर सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून बनाया जाएगा व किसानों को इसके लिए दिल्ली की तरफ नहीं देखना पड़ेगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि अपने वादे को परे रखते हुए मुख्यमंत्री सहित पार्टी के अन्य नेता किसानों को केंद्र के विरुद्ध भड़काने व उनका साथ देने की घोषणा करने में जुटे हुए हैं। किसान आंदोलन में शामिल संगठनों के नेताओं के सोशल मीडिया पर दिखाई जा रहे वक्तव्य को देखते हुए यह भी लगता है कि यह आंदोलन किसी विशेष मुद्दे पर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने से अधिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्र सरकार की छवि को प्रभावित करने के मुख्य उद्देश्य को लेकर किया जा रहा है। आन्दोलन में शामिल कई किसानों ने अपने व्यवहार से यह प्रदर्शित किया है कि उनकी दिलचस्पी समाधान निकालने में कम बल्कि आम लोगों को परेशान करके मोदी सरकार को नीचा दिखाने और विरोधी दलों के राजनीतिक हित साधने में अधिक है। इस बार विरोध प्रदर्शन में पंजाब को छोड़कर अन्य राज्यों के संगठनों ने शामिल होने को लेकर उत्साह नहीं दिखाया है। फिर भी वोट बैंक की राजनीति ने कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों को यह अवसर प्रदान कर दिया है कि वे किसानों के साथ नकली हमदर्दी दिखाकर उन्हें अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकें। देश के समक्ष कोई वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत करने में नाकाम रही कांग्रेस पार्टी ने यह घोषणा करने में देर नहीं लगाई कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो एमएसपी की कानूनी गारंटी के साथ स्वामीनाथन समिति की सिफारिश को पूरी तरह लागू किया जाएगा। किसान संगठन एमएसपी पर खरीद की गारंटी के साथ ही पिछले आंदोलन के समय दर्ज मुकदमों की वापसी, बिजली कानून रद्द करने, 10000 रूपए मासिक पेंशन, विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता छोड़ने, प्रदूषण रोकथाम से संबंधित कानून से छूट और मनरेगा के तहत कार्य दिवसों की संख्या दोगुनी करने की मांग कर रहे हैं। पिछली बार किसान संगठनों ने जब दिल्ली की घेराबंदी की थी तब भी यह सामने आया था कि देश-विदेश के अनेक संदिग्ध संगठनों ने आग में घी डालने का काम किया था। इसमें कोई शक नहीं कि देश के बहुसंख्यक किसानों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं है। उन्हें सरकार के सहयोग की आवश्यकता है। हालांकि मोदी सरकार ने किसानों के हक में कुछ कदम उठाए हैं जिनका किसानों को लाभ मिल रहा है। लेकिन अभी भी किसानों की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है और इसके लिए आवश्यक है कि देश के किसान संगठन सरकार के साथ लगातार वार्तालाप करते रहें व राजनीतिक दलों की राजनीति का शिकार न बनते हुए मात्र अपने लक्ष्य को सामने रखकर चलें।
