February 14, 2026

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बाजपेयी की कमाल की टाइमिंग

मनोज बाजपेयी ने शायद अपना हास्य पक्ष खोज लिया है और ‘द फैमिली मैन’ के बाद अब ‘इंस्पेक्टर ज़ेंडे’ में वह इसे पेश करने जा रहे हैं। ‘इंस्पेक्टर ज़ेंडे’ में बाजपेयी एक कुख्यात अपराधी के पीछे लगे मुंबई पुलिस अफसर की भूमिका निभा रहे हैं। गंभीर किरदारों विशेषकर ‘शूल’, ‘स्पेशल 26′ और ‘भोंसले’ में निभाए गए पुलिस से जुड़े पात्रों के लिए सराहे जाने वाले मनोज बाजपेयी का कहना है कि उन्हें वह हास्य पसंद है जो जीवन से जुड़ा और वास्तविकता के करीब हो।

मनोज बाजपेयी ने एक साक्षात्कार में एक समाचार एजेंसी से कहा कि द फैमिली मैन से पहले किसी ने नहीं सोचा था कि मैं भाव शून्य चेहरे के साथ भी हंसा सकता हूं। लोगों ने इसे स्ट्रेट फेस ह्यूमर नाम दिया है, लेकिन मुझे ऐसे हालातों से हास्य निकालना पसंद है जो असली हों और जिनसे लोग खुद को जोड़ सकें। उनका किरदार मधुकर जेंडे एक वास्तविक पुलिस अधिकारी से प्रेरित है, जिन्होंने कुख्यात सीरियल किलर चार्ल्स शोभराज को दो बार पकड़ा। फिल्म में शोभराज का नाम बदलकर ‘कार्ल भोजराज’ रखा गया है और इस भूमिका को जिम सर्भ ने निभाया है। बाजपेयी ने कहा कि फिल्म में उनका किरदार अजीबोगरीब जरूर है, लेकिन उसे जानबूझकर ऐसा नहीं बनाया गया है। यह विचित्रता दृश्य की संपूर्ण स्थिति से उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि वो कभी अपने किरदार से बाहर नहीं जाता। बात बस इतनी है कि वो मज़ेदार पल को भी पूरी गंभीरता से निभाता है। यही बात उस सीन को असरदार बनाती है और अभिनेता व किरदार के बीच दूरी नहीं आने देती, और यही सबसे मुश्किल हिस्सा होता है। लेकिन अगर आप कॉमेडी करने की कोशिश नहीं करेंगे, तो हास्य अपने आप सामने आ जाएगा।

रामगोपाल वर्मा की 1999 की फिल्म शूल में पहली बार मनोज बाजपेयी ने परदे पर पुलिसकर्मी का किरदार निभाया था। जब उनसे पूछा गया कि अपने पहले प्रमुख पुलिस किरदार से लेकर अब तक उनमें क्या बदलाव आया है तो बाजपेयी ने कहा कि शूल करते समय मैं एक बिल्कुल अलग अभिनेता था। शूल एक ऐसे युवा पुलिसकर्मी की कहानी थी जो अपने काम को लेकर आदर्शों से भरा हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे वह अपने परिवार, समाज और अपने ही विभाग से निराश होता जाता है। यह कहानी थी उस संघर्ष की जिसमें नियमों का पालन करने की जिद में वह अपने करीबी लोगों को एक-एक करके खोता जाता है।”

उन्होंने कहा, “मुझे उस किरदार में पूरी तरह डूबना पड़ा, लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि मैं अपना संतुलन खो बैठा। तब मुझे एहसास हुआ कि किसी किरदार को निभाने का यह सही तरीका नहीं है क्योंकि भले ही वह असर अस्थायी था लेकिन इसकी कीमत मुझे अपनी सेहत और मानसिक स्वास्थ्य से चुकानी पड़ी। इंस्पेक्टर जेंडे, जिसका निर्देशन चिन्मय मंडलेकर ने किया है, शूल के बिल्कुल उलट है।”

उन्होंने कहा कि यह दुनिया के सबसे खतरनाक साइकोपैथ (उन्मादी अपराधी) में से एक की गिरफ्तारी को लेकर एक हास्यपूर्ण प्रस्तुति है। चार्ल्स शोभराज सिर्फ एक अपराधी या साइकोपैथ नहीं था – वह वर्षों तक देशभर में चर्चा का विषय रहा, साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदायों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए भी एक पहेली बना रहा। वह पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुका था; लोगों की नजरों में वह अपराधी से ज्यादा एक रहस्यमयी हीरो जैसा था।

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