February 16, 2026

ट्रंप की धमकियों के बीच ईरान को मिला तालिबान का खुला साथ

अमेरिका के डर से पाकिस्तान की बोलती बंद

काबुल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर लगातार हमले की धमकियों ने खाड़ी देशों में भारी बेचैनी पैदा कर दी है। ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर ईरान के साथ बातचीत विफल होती है, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इन बढ़ते तनावों के बीच ईरान की पूर्वी सीमा पर एक दिलचस्प भू-राजनीतिक समीकरण उभर रहा है। जहां एक तरफ अफगान सरकार के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने खुले तौर पर ऐलान किया है कि किसी भी विदेशी हमले की स्थिति में अफगानिस्तान के लोग अपने ईरानी भाइयों के साथ एकजुट होकर खड़े रहेंगे, वहीं दूसरी ओर खुद को मुस्लिम दुनिया का रहनुमा बताने वाला पाकिस्तान अमेरिका के खौफ से पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है।
तालिबान ने ईरान के प्रति अपना मजबूत समर्थन जताते हुए उसे हर तरह की मदद का भरोसा दिया है। अफगान प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने हालिया 12 दिनों की लड़ाई में ईरान की जीत का दावा करते हुए जोर दिया कि तेहरान भविष्य में किसी भी हमले से अपनी रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है। इस कूटनीतिक गर्मजोशी का असर दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर भी साफ दिख रहा है। अफगानिस्तान में ईरान के राजदूत अलीरेजा बिकदेली ने हाल ही में संकेत दिया है कि तेहरान काबुल के साथ विभिन्न क्षेत्रों में रिश्ते मजबूत कर रहा है और तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता देने की राह में अब कोई बड़ी रुकावट नहीं बची है। रूस जैसे मजबूत सहयोगी द्वारा तालिबान को मान्यता दिए जाने के बाद, अब माना जा रहा है कि ईरान भी जल्द ही यह अहम कदम उठा सकता है।
ईरान के साथ लंबी सीमा और ऐतिहासिक संबंधों के बावजूद पाकिस्तान का मौजूदा रुख सवालों के घेरे में है। अक्सर वैश्विक मंचों पर मुस्लिम उम्माह की रक्षा की बड़ी-बड़ी कसमें खाने वाले पाकिस्तानी हुक्मरान, जिनमें सेना प्रमुख आसिम मुनीर से लेकर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तक शामिल हैं, इस समय अमेरिका के सामने बिल्कुल खामोश नजर आ रहे हैं। भू-राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान की इस चुप्पी के पीछे उसकी गहरी आर्थिक और कूटनीतिक मजबूरियां हैं। ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में पाकिस्तान को गाजा के लिए बनाए गए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में एक अहम जगह दी है, जिसे पाकिस्तान गंवाना नहीं चाहता। इसके अलावा, कंगाली की कगार पर खड़े पाकिस्तान को आईएमएफ जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से बेलआउट पैकेज हासिल करने के लिए हर हाल में अमेरिकी समर्थन की दरकार है। अपनी डूबती अर्थव्यवस्था को बचाने की इसी जद्दोजहद के कारण पाकिस्तान अमेरिका को नाराज कर ईरान के साथ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।

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