16 या 17 सितंबर कब है विश्वकर्मा पूजा?
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कन्या संक्रांति के पावन अवसर पर देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना का विधान है। भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम इंजीनियर और दिव्य वास्तुकार माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्वर्ग लोक, सोने की लंका, भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका नगरी और देवताओं के अमोघ अस्त्र-शस्त्रों की रचना भगवान विश्वकर्मा ने ही की थी। इस दिन कारखानों, दुकानों और कार्यस्थलों पर मशीनों, वाहनों और औजारों की विधि-विधान से पूजा की जाती है, जिससे कारोबार में उन्नति होती है और तकनीकी बाधाएं दूर होती हैं।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, विश्वकर्मा पूजा का पर्व सूर्य देव के सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में गोचर (कन्या संक्रांति) के दिन मनाया जाता है। इस बार सूर्य देव 17 सितंबर की तड़के 04:28 बजे कन्या राशि में प्रवेश करेंगे। चूंकि संक्रांति का क्षण 17 सितंबर की सुबह ब्रह्म मुहूर्त से पहले ही हो रहा है, इसलिए उदयातिथि और संक्रांति काल के अनुसार विश्वकर्मा पूजा का महापर्व 17 सितंबर को ही पूरे देश में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा।
17 सितंबर को पूजा-अर्चना के लिए कई अत्यंत शुभ योग बन रहे हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार इन मुहूर्तों में यंत्रों और भगवान विश्वकर्मा की आराधना कर सकते हैं:
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:58 बजे से 06:44 बजे तक
- प्रातः सन्ध्या: सुबह 06:21 बजे से 07:30 बजे तक
- सर्वार्थ सिद्धि योग: सुबह 07:30 बजे से शाम 04:23 बजे तक
- रवि योग: सुबह 07:30 बजे से शाम 04:23 बजे तक
- अभिजित मुहूर्त: दोपहर 01:20 बजे से 02:10 बजे तक
- विजय मुहूर्त: दोपहर 03:50 बजे से शाम 04:40 बजे तक
- गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:59 बजे से रात 08:23 बजे तक
- सायाह्न सन्ध्या: शाम 07:59 बजे से रात 09:09 बजे तक
विश्वकर्मा पूजन के लिए कुछ खास सामग्रियों का होना आवश्यक माना जाता है। इनमें भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर या प्रतिमा, लकड़ी की चौकी, लाल या पीला कपड़ा, कलश, गंगाजल, घी, इत्र, रोली, अक्षत (चावल), चंदन, सुपारी, पान के पत्ते, लौंग, इलायची, कपूर, जनेऊ, कलावा (मौली), मौसमी फल, फूल, मिठाई और नारियल मुख्य रूप से शामिल हैं।
पूजा के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और अपनी फैक्टरी, दुकान या कार्यस्थल की अच्छी तरह साफ-सफाई करें। पूरे परिसर में गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और अष्टदल कमल बनाकर उस पर जल से भरा कलश तथा भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित करें। अपने कार्य में इस्तेमाल होने वाले सभी औजारों, मशीनों और वाहनों को धोकर उन पर रोली, हल्दी और चंदन का तिलक लगाएं और कलावा बांधें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती करें, फल-मिठाई का भोग लगाएं और व्यापार में तरक्की व सुरक्षा की कामना करते हुए सभी में प्रसाद वितरित करें।
