April 10, 2026

ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिका के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए टेबल पर बैठने से इनकार किया

नई दिल्ली, अभी तो पाकिस्तान ने अमेरिका-ईरान जंग के बीच शांतिदूत बनने वाली अफवाह पर ठीक से अपनी पीठ भी नहीं थपथपाई थी कि अचानक उसकी पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिखने लगी। अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर कराने का दावा करने वाला पाकिस्तान अब इजरायल के खिलाफ की गई बयानबाजी की वजह से चिंता में है। दूसरी तरफ ईरान जिसका वह शुभचिंतक बनने की जुगत में है, वही पाकिस्तान के इस बिचौलिये वाले व्यवहार को पचा नहीं पा रहा है। ईरान ने इस्लामाबाद में अमेरिका के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के लिए टेबल पर बैठने से साफ इनकार कर दिया। भारत तो पहले से ही कहता रहा है कि अमेरिका और चीन दोनों ने अपने फायदे के लिए पाकिस्तान के कंधे पर रखकर सीजफायर वाली बंदूक चलाई। अमेरिका को अब तक इस युद्ध में इतना बड़ा नुकसान हुआ, जिसकी कभी उसने कल्पना भी नहीं की थी। ऐसे में वह इस युद्ध से सम्मानजनक रूप से निकलना चाहता था और इसके लिए अमेरिका ने ढुलमुल पाकिस्तान को बिचौलिया बनाया। वहीं, चीन के कर्ज तले दबे पाकिस्तान को भी पता है कि उसे अपने गले में फंदा लगने से बचने के लिए चीन की छत्रछाया चाहिए। साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए भी उसकी मदद चाहिए। ऐसे में अपनी दयनीय हालत को बेहतर बनाने के लिए पाकिस्तान अमेरिका और चीन के सामने जाकर घुटनों के बल बैठ गया। अमेरिका भी चालाक निकला। उसने ईरान से वार्ता के लिए पाकिस्तान के इस्लामाबाद को चुना, जबकि अमेरिका के कोई भी शीर्ष नेता या अधिकारी 2006 के बाद से कभी भी सुरक्षा कारणों की वजह से पाकिस्तान नहीं गए हैं। मतलब साफ है कि अमेरिका जानता था कि अगर सीजफायर की शर्तों को वह मान नहीं पाएगा तो वह इस्लामाबाद में सुरक्षा का हवाला देकर अपने लोगों को वार्ता के लिए नहीं भेजेगा और इस वार्ता की असफलता की पूरी जिम्मेदारी पाकिस्तान के ऊपर आएगी। अमेरिका इससे भी साफ-साफ बचकर निकल जाएगा। लेकिन, पाकिस्तान ने कभी नहीं सोचा था कि इस्लामाबाद आने से ईरान भी इनकार कर देगा और वार्ता से पहले ही उसकी जमकर किरकिरी हो जाएगी।
भारत का विपक्ष भले कई मुद्दों पर सरकार के साथ नहीं हो लेकिन पाकिस्तान द्वारा सीजफायर वाले ‘दलाल’ की भूमिका को लेकर तो जरूर सरकार के साथ खड़ा है। प्रियंका चतुर्वेदी और शशि थरूर जैसे वरिष्ठ भारतीय राजनेताओं ने तो पाकिस्तान की ऐसी इज्जत उतारी की वह भी शर्मा गया होगा। प्रियंका चतुर्वेदी ने तो पूरी टाइमलाइन के साथ बता दिया कि कैसे पाकिस्तान अमेरिका का पाला हुआ जानवर है। वहीं, शशि थरूर ने कहा कि कई संकेत ऐसे हैं जो दिखाते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में असली फैसले कहीं और से लिए जा रहे हैं, पाकिस्तान तो यहां सिर्फ एक मुखौटा है। उन्होंने शहबाज शरीफ के एक सोशल मीडिया पोस्ट में इस्तेमाल की गई भाषा का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि इसे देख लीजिए ये अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान से मेल खाती थी, जिससे यह संदेह और गहरा होता है।
शशि थरूर ने उसी बात की तरफ इशारा किया जो इस लेख में पहले लिखा गया है कि पाकिस्तान ऐसी भूमिका निभा सकता है, जिसमें अमेरिका और ईरान तनाव कम हो और दोनों युद्धग्रस्त देशों को ऐसा भी न लगे कि वे एक-दूसरे के सामने झुक रहे हैं।
दूसरी तरफ पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल और यहूदियों को लेकर कुछ ऐसा कह दिया कि इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू भड़क उठे और पाकिस्तान को सीधी चेतावनी दे दी।
दरअसल, यह अब पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय बन गया है। पाकिस्तान को पता है कि इजरायल अमेरिका नहीं है, वह अपनी मातृभूमि और अपने लोगों के खिलाफ अपमान किसी भी हालत में बर्दाश्त करने के मूड में नहीं होता है। हालांकि इजरायल से मिली तीखी प्रतिक्रिया के बाद ख्वाजा आसिफ अपनी पोस्ट डिलीट कर मैदान छोड़कर भाग गए।
इजरायल के खिलाफ आग उगलते हुए पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा, “मैं उम्मीद और प्रार्थना करता हूं कि जिन लोगों ने फिलिस्तीनी धरती पर इस कैंसर जैसे राज्य का निर्माण किया है, वे यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाएं और उन्हें नरक में जलाएं।” ख्वाजा आसिफ के इस घटिया बयान पर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पाकिस्तान को सीधी चेतावनी देते हुए कहा है कि इजरायल के विनाश की बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। पीएम नेतन्याहू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का इजरायल को खत्म करने का आह्वान बहुत बुरा है। यह ऐसा बयान नहीं है जिसे किसी भी सरकार से बर्दाश्त किया जा सके, खासकर उस सरकार से जो शांति के लिए न्यूट्रल आर्बिटर होने का दावा करती है।”
अभी तक तो पाकिस्तान को अपनी सीमा पर संकट का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन, पाक को पता है कि इजरायल से दुश्मनी उसे कितनी महंगी पड़ सकती है। पाकिस्तान के पश्चिम में ईरान है जो खुद युद्ध से जूझ रहा है। पूर्व की दिशा में पाकिस्तान की सबसे लंबी और संवेदनशील सीमा भारत के साथ है। जिसके साथ आजादी के बाद से ही उसने संबंध सामान्य रहने देने में अडंगा डाला है। उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है, जहां तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ हथियार लेकर अड़ा हुआ है। गिलगित का हिस्सा जिस पर अवैध रूप से पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है, चीन सीमा के नजदीक है और वह यहीं से पाकिस्तान में घुस रहा है। वहीं अरब सागर के पार ओमान के साथ इसकी समुद्री निकटता बहुत अधिक है।
अब पाकिस्तान की मध्यस्थता वाले बिंदु पर आते हैं। ईरान और इजरायल से इस मध्यस्थता के लिए उसे फटकार मिली है। इजरायल तो इसे ‘नाकाबिल और अविश्वसनीय’ मध्‍यस्‍थ बता चुका है। वहीं ईरान भी इसे समय-समय पर फटकार लगाता रहा है। ईरान तो पाकिस्तान को आ‍तंकवादी ठिकानों का पनाहगार मानता है। ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिका ने पाकिस्‍तान को ही क्‍यों इस सीजफायर के लिए मोहरा बनाया? इसका जवाब है अमेरिका ने पाकिस्‍तान को भारी कर्ज दे रखा है, साथ ही आईएमएफ और विश्‍व बैंक की ओर से लोन देने के फैसले को भी सपोर्ट करता रहा है। पाकिस्तान पर कर्ज सिर्फ पश्चिमी देशों और संस्थानों का नहीं है, बल्कि चीन भी उसका बड़ा कर्जदाता रहा है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर परियोजनाओं के तहत चीन ने बड़े स्तर पर पाकिस्तान में निवेश और लोन दिया है। ऐसे में जब जरूरत होती है पाकिस्तान पर वैश्विक शक्तियों का दबाव बढ़ता है और उसे चीन और अमेरिका जैसे देश अपने लिए मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
अब इस्लामाबाद में होने वाले ईरान-अमेरिका बातचीत की टेबल पर नजर डालें तो पता चल जाएगा कि इसमें पाकिस्तान की औकात किस तरह की नजर आई है। दरअसल, ईरान की मीडिया की तरफ से साफ कहा जा रहा है कि उनके विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागर कालीबाफ दोनों ही तेहरान में मौजूद हैं और अपने काम में लगे हुए हैं। ईरान साफ कह रहा है कि जब तक लेबनान पर हमला नहीं रूकेगा, कोई बातचीत नहीं होगी।
ईरान और अमेरिका दोनों ही सीजफायर के बाद से अपनी-अपनी जीत का दावा कर चुके हैं तो फिर हार किसकी हुई है। दरअसल, इसमें हार पाकिस्तान की है। अगर वार्ता असफल हुई और सीजफायर टूटा तो पाकिस्तान के लिए ईरान अमेरिका से बड़ा दुश्मन बन जाएगा और अगर वार्ता सफल रही तो इजरायल को ललकारना पाकिस्तान को भारी पड़ेगा।
पाकिस्तान ने इस मध्यस्थता में अपनी पूरी राजनीतिक पूंजी लगा दी है। अगर बातचीत विफल होती है तो पाकिस्तानियों के लिए यह खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसे हालात हो जाएंगे।
पाकिस्तान को यह भी पता है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई ठोस समझौते की स्थिति नहीं बनती है तो उसके पास इतनी ताकत नहीं हैं कि वह अमेरिका और ईरान को इस समझौते को मानने के लिए मजबूर कर सके।

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