April 2, 2026

8वीं पास ने बनाया इंटरनेशनल नेटवर्क; टेलीग्राम पर लगती थी अंगों की बोली

फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा कानपुर का किडनी कांड

कानपुर, उत्तर प्रदेश के कानपुर में चल रहे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट की जांच में ऐसे रोंगटे खड़े कर देने वाले खुलासे हुए हैं, जो किसी भी इंसान को दहलाने के लिए काफी हैं। जांच एजेंसियों को पता चला है कि इस खौफनाक गोरखधंधे को बिल्कुल किसी हॉलीवुड या बॉलीवुड थ्रिलर फिल्म की तर्ज पर अंजाम दिया जाता था। अब तक शहर में 60 से ज्यादा अवैध किडनी ट्रांसप्लांट होने की बात सामने आ चुकी है, जिसमें विदेशी मरीजों का कनेक्शन भी जुड़ गया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे इंटरनेशनल नेटवर्क को चलाने वाला मुख्य सरगना कोई बड़ा सर्जन नहीं, बल्कि महज 8वीं पास एक एंबुलेंस ड्राइवर है।
इन अवैध ऑपरेशनों को इतनी चालाकी और गोपनीयता से किया जाता था कि पुलिस या स्वास्थ्य विभाग को भनक तक न लगे। जिस दिन किसी मरीज का किडनी ट्रांसप्लांट होना होता था, उस दिन अस्पताल के नियमित स्टाफ को छुट्टी पर भेज दिया जाता था। इसके बाद एक बेहद खास सर्जिकल टीम वहां पहुंचती थी, जो सिर्फ चंद घंटों के लिए बुलाई जाती थी। तेजी से ऑपरेशन को अंजाम देने के बाद मरीजों को तुरंत अज्ञात और अलग-अलग ठिकानों पर शिफ्ट कर दिया जाता था ताकि कोई भी लिंक न जुड़ सके। पुलिस को चकमा देने के लिए इन मरीजों का कोई मेडिकल रिकॉर्ड या आधिकारिक एंट्री रजिस्टर में दर्ज नहीं की जाती थी।
पुलिस को इस काले कारोबार की भनक पिछले साल ही लग गई थी, लेकिन यह नेटवर्क इतना शातिर था कि मुख्य कड़ी तक पहुंचने में महीनों लग गए। जब आरोही हॉस्पिटल पर छापा मारकर उसे सील किया गया, तब जाकर इस सिंडिकेट की परतें खुलनी शुरू हुईं। जांच की आंच आहूजा हॉस्पिटल तक भी पहुंची, जहां 7-8 ट्रांसप्लांट होने के सबूत मिले हैं। इसी दौरान एक विदेशी महिला के ट्रांसप्लांट का मामला सामने आने से इसके अंतरराष्ट्रीय तारों का भी पर्दाफाश हुआ। पुलिस ने जब मास्टरमाइंड शिवम अग्रवाल उर्फ ‘काना’ को गिरफ्तार किया तो जांच अधिकारी भी सन्न रह गए। शिवम महज 8वीं पास है और पहले एंबुलेंस चलाता था। बाद में उसने गले में स्टेथोस्कोप डालकर खुद को एक बड़ा ‘विशेषज्ञ डॉक्टर’ बताना शुरू कर दिया और भोले-भाले लोगों को अपने जाल में फंसाकर इस अवैध नेटवर्क तक पहुंचाने लगा।
इस गिरोह का काम करने का तरीका पूरी तरह से हाईटेक था। मेरठ का डॉक्टर अफजाल इस नेटवर्क के डिजिटल ऑपरेशंस को संभालता था। उसने ‘टेलीग्राम’ ऐप पर एक सीक्रेट ग्रुप बनाया हुआ था, जहां डोनर और रिसीवर (किडनी लेने वाले) की सीधी डील होती थी। यहीं तय होता था कि कितने पैसे का लेन-देन होगा और ऑपरेशन किस दिन होगा। इसी टेलीग्राम ग्रुप के जरिए मेरठ की पारुल तोमर का सौदा बिहार के एक एमबीए छात्र आयुष चौधरी के साथ तय हुआ। दोनों किडनी खराब होने के कारण पारुल ने अपनी जिंदगी बचाने के लिए करीब 80 लाख रुपये खर्च किए, लेकिन अस्पतालों की घोर लापरवाही ने उनकी जान खतरे में डाल दी।
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को गंभीर संक्रमण से बचाने के लिए सख्त आइसोलेशन की जरूरत होती है, लेकिन इन अवैध अस्पतालों में बुनियादी सावधानियों की भी धज्जियां उड़ाई गईं। लोगों की लगातार आवाजाही से पारुल को भयंकर इन्फेक्शन हो गया। उनका हीमोग्लोबिन गिरकर 6.3 पर आ गया और यूरिन आउटपुट कम होने से हालत बेहद नाजुक हो गई, जिसके बाद उन्हें लखनऊ के पीजीआई रेफर करना पड़ा। डोनर आयुष की हालत स्थिर है, लेकिन उन्हें भी सही इलाज न मिलने पर खतरा बना हुआ है। इस पूरे कांड ने सिस्टम की पोल भी खोल दी है। कानपुर मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने खुद माना है कि उनके पास किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति और जरूरी दवाइयां ही नहीं हैं। इसी बेबसी और अधिकृत केंद्रों की कमी का फायदा उठाकर ऐसे मौत के सौदागर अपना करोड़ों का रैकेट चला रहे हैं। पुलिस अब तक कई डॉक्टरों और अस्पताल संचालकों को गिरफ्तार कर चुकी है, लेकिन असली नेटवर्क का पूरा कच्चा चिट्ठा खुलना अभी बाकी है।

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