अभिमान ही भक्तिमार्ग का शत्रु है: सुमित शास्त्री
बेबाक़ रघुनाथ शर्मा, जसूर: अभिमान ही भक्तिमार्ग का शत्रु है, उक्त उद्घार पंडित सुमित शास्त्री ने गांव ढन में चल रही श्रीमद भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रोताओं को कहे। शास्त्री ने गजेंद्र मोक्ष का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि त्रिकूट नामक पर्वत पर रहने वाले गजराज को अपने बल व परिवार का बड़ा अभिमान था, एक दिन जब वो सरोवर में स्नान के लिए अपने परिवार के साथ गया तो वहां उसका पैर एक ग्राह ने पकड़ लिया। गजराज व उसका परिवार छुड़ाने में असमर्थ रहे। तब गजराज को वैराग्य हो गया और पूर्व जन्म की स्मृति के कारण उसने भगवान नारायण की स्तुति की और प्रभु ने आकर सुदर्शन से ग्राह का मुख फाड़ कर गजराज को मुक्त करवा दिया।
पंडित शास्त्री ने समुद्रमंथन, बलि-वामन चरित्र, मत्स्य अवतार की कथा, भगवान श्रीराम की वंशावली व भगवान श्री कृष्ण के जन्म की कथा का भी भक्तगण श्रोताओं को विस्तार से श्रवण करवाई। कथा की समाप्ति पर सभी श्रदालुओं को माखन मिश्री व टाफियों का प्रसाद बांटा गया।कथा सभा स्थल पर क्षेत्र की काफी महिलाओं, भक्तों सहित मनजीत सिंह, महिंद्र सिंह, रघुवीर सिंह, बक्शी राम, सुरजीत कौर, आरती देवी, रमा व कृष्णा देवी आदि श्रोताओं ने भाग लिया।
