February 15, 2026

आखि़र महंगी पड़ गई ‘खटाखट’ चुनावी घोषणाएं

मल्लिकार्जुन खड़गे का वक्तव्य सभी राजनीतिक दलों के लिए सबक

हिमाल चन्द शर्मा: कर्नाटक में एक कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का यह कहना कि चुनावों में ऐसी घोषणाएं न की जाएं जिससे बाद में सरकार की बदनामी हो, आज के समय का एक कटु सत्य है। मल्लिकार्जुन खड़गे की यह साफगोई आज के समय की चुनावी राजनीति में मुफ्त की घोषणाओं की हो चुकी ‘अति’ को दर्शा रही है। भले ही भाजपा सहित कई राजनीतिक दल मल्लिकार्जुन खड़गे के बयान पर चुटकियां ले रहे हैं लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर जो भी कहा उससे कांग्रेस पार्टी व अन्य राजनीतिक दल थोड़ा भी सबक लेंगे तो देश को यह सकारात्मक दिशा प्रदान करेगा।

चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा ‘रेवड़िया’ बांटने की घोषणाएं करना अब आम हो चुका है। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान पहले भी लोक लुभावन नारों द्वारा जनता को अपने पक्ष में किया जाता रहा है। इंदिरा गांधी के समय भी चुनावों में ‘गरीबी हटाओ’ जैसे नारे दिए जाते थे। लेकिन ऐसे नारों का मतलब स्पष्ट रूप से धन बांटने या जनता को सीधे ललचाने की श्रेणी में नहीं आता था। लेकिन वर्तमान दौर में ऐसी चुनावी घोषणाएं की जाने लगी हैं जिनमें हर वर्ग व मतदाता को सीधे तौर पर लाभ देने की बात की जाती है।

अन्ना आंदोलन से पैदा हुई आम आदमी पार्टी ने 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार मिटाने के वादे के साथ-साथ मुफ़्त बिजली, मुफ़्त पानी, मुफ़्त बस सफर देने जैसे अनेकों चुनावी वादे किए थे। यहां आम आदमी पार्टी को अगले वर्ष मिले प्रचंड बहुमत ने अन्य राजनीतिक दलों के लिए एक मिसाल बना दी व सभी दल एक दूसरे से बढ़-चढ़कर चुनावी रेवड़िया बांटने लगे। 2014 में केंद्र की सत्ता में भाजपा के आने व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनता पर मजबूत पकड़ हो जाने के बाद कांग्रेस हाशिए पर आ गई थी। केंद्र ही नहीं बल्कि राज्यों में भी कांग्रेस पार्टी की दशा बिगड़ती चली गई। पार्टी ने केंद्र व राज्यों की सत्ता में पुन वापसी के लिए केजरीवाल से भी दो कदम आगे बढ़कर चुनावों के दौरान ‘खटाखट’ रेवड़ियां बांटनी शुरू कर दी। अगर पुरानी पेंशन स्कीम की बात करें तो कांग्रेस पार्टी 2004 से 2014 तक केंद्र की सत्ता पर काबिज थी। लेकिन इस दौरान पार्टी या सरकार ने कभी ओपीएस की बात नहीं की। लेकिन केंद्र व कई राज्यों में भाजपा की सरकारें आने के बाद कांग्रेस ओपीएस व खटाखट नोट बांटने की योजनाएं जनता में बिखेरने लगी। इससे कई राज्यों में उसकी सरकारें तो बन गई लेकिन राज्यों की वित्तीय दुर्दशा जगजाहिर होने लगी।

हिमाचल प्रदेश में भी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 10 गारंटियां दे दीं जिनमें पुरानी पेंशन बहाल करना, युवाओं को 5 लाख रोजगार देना, हर महिला को हर माह 1500 रुपए, हर घर मुफ्त 300 बिजली यूनिट, युवाओं के लिए 680 करोड़ का स्टार्टअप, मोबाइल क्लीनिक से हर गांव में मुफ्त इलाज, पशुपालकों से 100 रुपए लीटर दूध व 2 रुपए किलो गोबर खरीदना जैसी चुनावी रेवड़ियां शामिल है। यह घोषणाएं आज हिमाचल सरकार के गले की फांस बन चुकीं हैं। इन्हें आंशिक रूप से भी लागू करने के लिए सरकार को इधर-उधर कटौतियां करनी पड़ रही है। दूसरी तरफ वित्तीय संकट का सामना कर रही हिमाचल सरकार का देश भर में राजनीतिक मंचों पर मजाक उड़ाया जा रहा है।

मल्लिकार्जुन खड़गे का वक्तव्य राजनीतिक दलों के लिए एक आईना है व भाजपा को भी इसका राजनीतिक लाभ लेने की बजाय इससे सीख लेने की जरूरत है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियों है अतः दोनों को देश हित में एक साथ बैठकर ऐसी ‘खटखट चुनावी रेवड़ियों’ को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की दिशा में प्रयास करने चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *