February 25, 2026

बॉम्बे हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम 2023 को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया

नई दिल्ली,  बॉम्बे हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम 2023 को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। इन बदलावों से केंद्र सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अपने मामलों के बारे में फर्जी और भ्रामक जानकारी से मुकाबला करने के लिए इकाइयां स्थापित करने की शक्ति मिलती थी। हाईकोर्ट में न्यायाधीश अतुल चंदूरकर ने फैसला सुनाते हुए कहा कि मैंने इस मामले पर विस्तार से विचार किया है। इन बदलावों से भारतीय संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। उन्होंने कहा कि बदलाव करने के लिए इस्तेमाल किया गया फर्जी, भ्रामक और गलत को सही तरीके से स्पष्ट नहीं किया गया है। इसलिए इससे संविधान के आर्टिकल 19 और 19(1) का उल्लंघन होता है। माननीय हाइकोर्ट द्वारा यह फैसला जनवरी में दो सदस्यीय खंडपीठ के विभाजित फैसले के बाद आया है, जिसमें जस्टिस गौतम पटेल और जस्टिस नीला गोखले ने विभाजित फैसला सुनाया था।

जनवरी में फैसला सुनाते समय जस्टिस पटेल ने फ्रीडम ऑफ स्पीच के उल्लंघन का हवाला देते हुए इन बदलावों को रद्द कर दिया था तो वहीं जस्टिस गोखले ने उनकी वैधता को बरकरार रखा था। उन्होंने कहा था कि यह चिंताएं संभावित पूर्वाग्रह पर आधारित हैं और निराधार हैं। उन्होंने कहा कि इन बदलावों ने फ्रीडम ऑफ स्पीच के ऊपर कोई पाबंदी नहीं लगाई है।

सरकार ने क्या किया था बदलाव
दरअसल, केंद्र सरकार ने आईटी नियमों में 2023 में संशोधन किया था। इसके तहत यदि सोशल मीडिया पर कोई ऐसी पोस्ट मिलती है जो सरकार के खिलाफ फर्जी, झूठी और भ्रामक जानकारी फैला रही है तो वह इसे मार्क करके मध्यस्थ( सोशल मीडिया प्लेटफार्म) को सूचित कर सकती है। सरकार द्वारा सूचित करने के बाद मध्यस्थ को उसे हटाने ही होता है अगर वह उसे हटाने के लिए मना करता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इस विवादास्पद नियम को कॉमेडियन कुणाल कामरा, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और अन्य मीडिया संस्थानों सहित कई लोगों ने चुनौती दी थी। अपनी याचिका लगाते हुए उन्होंने कहा था कि सरकार विचारों पर जरूरत से ज्यादा पाबंदी लगाना चाहती है। कामरा ने कहा कि इन बदलावों में जो शब्द स्पष्ट किए गए हैं वह बहुत ही अस्पष्ट हैं इससे अभिव्यक्ति की आजादी पर उल्टा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए मध्यस्थ सामग्री को हटा देंगे।

केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संशोधनों का बचाव करते हुए तर्क दिया कि उनका उद्देश्य आलोचना या व्यंग्य को रोकना नहीं था बल्कि झूठी जानकारी के प्रसार का मुकाबला करना था। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद आया है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही इस पर रोक लगा चुका है।

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