इंटरव्यू के दौरान पूर्व गृह मंत्री की आंखों में आए आंसू
चंडीगढ़, हर दर से मायूस पीड़ित के लिए आखिरी और सबसे बड़ी उम्मीद अनिल विज का दरबार अब पूरे प्रदेश की जनता को इंसाफ नहीं दे रहा, क्योंकि हाल फिलहाल वह मंत्री नहीं है, बतौर विधायक वह अब केवल अपने विधानसभा क्षेत्र की जनता की समस्याएं सुनते हैं। प्रदेश की जनता के सबसे चहेते और पसंदीदा नेता अनिल विज आज बदली राजनीतिक परिस्थितियों में लगभग साइड लाइन कर दिए गए हैं। जनसंघ से जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी के रूप में हुए बदलाव के हर दौर में पार्टी का झंडा बुलंद करने वाले -तत्कालीन सरकारों के लिए खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले- हर प्रकार का त्याग और बलिदान करने वाले अनिल विज आज किस दौर से गुजर रहे हैं और उनकी आगामी कार्यशैली क्या देखने को मिलेगी, इस बारे में विस्तार से बात हुई। उत्तम हिन्दू से बातचीत के दौरान अनिल विज ने पुराने उस दौर के संघर्ष की यादें ताजा की जब पार्टी और संगठन के लिए उन्होंने खूब लाठियां खाई। इस मौके पर अनिल विज भावुक हो गए और उनकी आंखों में पानी (आंसू) दिखने लगे। उन्होंने कहा कि मेरी यह गलतफहमी दूर हो गई कि मैं पार्टी का कोई बड़ा व्यक्ति हूं। उन्होंने कहा कि मैं एक साधारण और छोटा सा कार्यकर्ता हूं, इसी कारण से उनसे मुख्यमंत्री बदलाव की बात शेयर नहीं की गई। बातचीत के दौरान उन्होंने भाजपा को छोड़ कांग्रेस में शामिल होने वाले पिता- पुत्र वीरेंद्र और बृजेंद्र को प्रवासी पॉलीटिशियन बताया। साथ ही उन्होंने साफ किया कि वह अपने विधानसभा क्षेत्र को छोड़ कहीं भी चुनाव प्रचार के लिए कतई नहीं जाएंगे। कई महत्वपूर्ण विषयों पर हुई बातचीत के कुछ अंश आपके सामने प्रस्तुत हैं:-
देश में राजनीति या तो पैसे के बल पर होती है यह बाहुबली के दम पर। 1969-70 में पढ़ाई के दौरान ही विद्यार्थी परिषद से जुड़ा और उसके माध्यम से संघ से जुड़ गया। 1972 में मेरी ग्रेजुएशन हुई और 1974 में बैंक में नौकरी मिल गई। लेकिन सरकारी कर्मचारियों के बावजूद संगठन और उनसे जुड़ी संस्थाओं से लगातार जुड़ा रहा। विश्व हिंदू परिषद का भी महामंत्री रहा और भारत विकास परिषद का भी। बहुत रुचि से मैंने संगठनात्मक रूप से काम किया। उस समय जनसंघ का चुनाव निशान दीपक होता था मैंने दीपक के लिए भी वोट मांगी है। उम्र काफी छोटी थी लेकिन मेहनत बहुत की है। एमरजेंसी के समय को भी बहुत नजदीक से देखा। उस समय भी काफी सक्रियता के साथ काम किया। नियमित हर चुनाव में काम करते रहे। बैंक से उस दौरान एक-एक दो-दो महीने की छुट्टी लेकर भी काम किया। इमरजेंसी के वक्त जब सरकारी कर्मचारी इस प्रकार का कोई नाम नहीं लेता था उस दौरान भी मैंने दो महीने की छुट्टी ली, एक महीना सूरजभान जी और एक महीना सुषमा स्वराज जी के साथ लगाया। कभी नहीं सोचा था कि विधायक बनूँगा, लेकिन 1990 में सुषमा स्वराज जी के राज्यसभा में जाने के बाद अंबाला कैंट उप चुनाव घोषित हुआ। काफी लोग चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन संगठन मुझे लड़वाना चाहता था और मैं मना कर देता था। क्योंकि नौकरी से मैं काफी खुश था। नौकरी और पार्टी दोनों का काम कर रहा था। मुझ पर काफी दबाव पड़ा। नॉमिनेशन के दो दिन पहले मुझे रोहतक बुलाया गया। दो सीनियर नेता जगदीश गोयल और सोम प्रकाश चोपड़ा भी मेरे साथ वहां गए। जहां मुझ पर चुनाव लड़ने के लिए दबाव डाला गया। मेरी 17 साल की नौकरी थी। 20 साल की होने पर पेंशन और अन्य सरकारी फंड इत्यादि मिलते, इसलिए नहीं छोड़ना चाहता था। लेकिन मुझ पर रिजाइन देने का दबाव पड़ा। फिर मैंने चुनाव लड़ा और चुनाव जीत गया। सीढ़ियां चढ़ता रहा बहुत से उतार-चढ़ाव जीवन में आए। लेकिन अपना काम हम लगातार समर्पित भाव से करते रहे।
इसका क्या कारण था, मैं नहीं जानता। आरएसएस ने मुझे कहा त्यागपत्र दे दो, तो मैंने दे दिया। मैं 14 वर्ष तक पार्टी से बाहर रहा, चाहता तो किसी भी पार्टी में जा सकता था। बंसीलाल की पार्टी भी कहती थी कि आ जाओ। चौटाला ने भी कहा और अन्य पार्टियों के नेता भी मेरे घर पर आए। चाहता तो किसी भी पार्टी में जा सकता था, लेकिन नहीं गया। मैं बीजेपी के दरवाजे पर बैठा रहा और पूछता रहा कि मुझे क्यों निकाला है, मेरा दोष बताओ। लेकिन किसी ने नहीं बताया। काफी हायर लेवल पर बात जाने के बाद जिसने मुझसे त्यागपत्र लिया था वह उन दिनों श्रीनगर में काम कर रहा था, उसे श्रीनगर से बुलाया गया, उसने आने के बाद बताया कि मुझसे गलती हो गई थी। गलती किसी ओर ने की थी लेकिन भाजपा की मीटिंग के दौरान यह कहा गया कि गलती अनिल विज ने की थी। लेकिन कुछ समय के बाद ही खुद गलती करने वाले ने अपनी गलती को माना। इस प्रकार की घटनाएं मेरे साथ घटी है। 14 साल भगवान राम ने भी वनवास काटा, लेकिन वह भगवान थे और मैं एक आम आदमी। मैं किस तरह से 14 साल जीवित रहा मैं ही जानता हूं। मैंने उस दौरान दो चुनाव भी जीते। मेरे खिलाफ बड़ी ताकत लगाई गई, तीसरा चुनाव भी मैं केवल 562 वोटो से ही हारा। 2009 में जब विजय गोयल हरियाणा प्रभारी थे मुझे रोज फोन करते थे कि आपसे बात करनी है। मैं कहता रहा कि चुनाव के बाद ही बात करूंगा, मुझे आपसे अभी कोई बात नहीं करनी। क्योंकि मैंने अपने चुनाव कार्यालय का भी उद्घाटन कर लिया था, पूरे शहर में मेरे हार्डिंग लग गए थे, लेकिन रोजाना जब बात करने के लिए दबाव आया तो मेरे सीनियर लोगों ने बात करने की सलाह दी। हम गए, हमें विजय गोयल ने कमरे में बिठाया और चाय पीने के लिए बोलकर यह कह कर चले गए कि थोड़ी देर में आकर बात करते हैं। 1 घंटे बाद ही टीवी पर भाजपा की लिस्ट जारी होने की पट्टी चल गई, जिसमें कैंट से अनिल विज को उम्मीदवार बनाया गया। जबकि मैंने ना ही कोई एप्लीकेशन दी थी और न हीं मैं पार्टी का सदस्य था। मेरे साथ 25 साथी दिल्ली गए हुए थे, मुझे इसलिए गुस्सा आया, क्योंकि मेरे साथी सोचेंगे कि शायद पहले से ही कोई बातचीत कर ली थी, हमें केवल मूर्ख बनाने के लिए साथ लाया है, सारे साथी मेरी तरफ प्रश्न चिन्ह लगाकर देखने लगे। लेकिन मेरी हमेशा आदत रही है कि मैं हर स्थिति को साथियों से स्पष्ट करके चलता हूं। फिर मैं बीजेपी हेडक्वार्टर अशोका रोड गया, जहां विजय गोयल मिले। मैंने कहा कि मुझे बात करने के लिए बुलाया था और नाम अनाउंस कर दिया तो गोयल ने कहा कि हमने जो करना था कर दिया, तुझसे जो होता है कर ले। बात कर ही रहे थे इतने में राजनाथ सिंह जी आ गए। मैंने उन्हें नमस्ते की। उन्होंने कहा कि अनिल भाई सीट चाहिए। हरियाणा में बहुत बुरा हाल है। मैंने कहा सीट तो आ ही जाएगी। सीट की कोई दिक्कत नहीं है। इस प्रकार से मैं 2009-2014 और 2019 में भी चुनाव जीता। मुझे लोग जिताते हैं और छह बार मैं चुनाव जीत चुका हूं। मैंने बहुत टफ टाइम फेस किए हैं।
