January 26, 2026

भारत की बढ़ती शक्ति को पचा नहीं पा रहे हैं कुछ विकसित देश

एक तरफ विश्व के अग्रणी देश भारत के साथ संबंध सुधारने में लगे हुए हैं वहीं दूसरी तरफ उन्हें जब भी अवसर मिलता है वे भारत के लोकतंत्र, मानवाधिकार या न्याय व्यवस्था पर अनुचित टिप्पणी करने से परहेज भी नहीं करते हैं। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड जैसे देश भारत विरोधी तत्वों की शरणस्थली बने हुए हैं व वहां भारत के प्रति कुछ संगठन वर्षों से खुलकर दुष्प्रचार करते आ रहे हैं। वहां की सरकारें इन संगठनों पर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नकेल कसने से परहेज करती है। खालिस्तानी या अन्य देश विरोधी तत्व वहां रह रहे भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार ही नहीं करते बल्कि भारतीय झंडे का भी अक्सर अपमान करते हैं। लेकिन वहां की सरकारों को इन भारत विरोधी तत्वों में ऐसा कुछ नजर नहीं आता जिस पर उन देशों के कानून के अनुसार रोक लगाना आवश्यक हो।

स्पष्ट है कि ये देश विश्व में भारत के बढ़ते कद से तो प्रभावित है लेकिन अंदर ही अंदर वे इस बात को पचा भी नहीं पा रहे हैं। ऐसे में जब भी उन्हें मौका मिलता है वे भारत के प्रति विपरीत टिप्पणी करने से स्वयं को रोक नहीं पाते। उनकी भारत विरोधी टिप्पणियों से उनकी आंतरिक पीड़ा तो झलकती ही है साथ में उनका दोगलापन भी बाहर आता है। अगर ये देश लोकतंत्र और मानवाधिकार के इतने ही रक्षक है तो उन्हें पाकिस्तान,चीन, उत्तर कोरिया सहित दुनिया भर के दर्जनों देशों में हो रहे मानवाधिकार के हनन के विरोध में भी खुलकर सामने आना चाहिए।

विदेशी धरती से भारत विरोधी टिप्पणियां या गतिविधियों को अब भारत भी गंभीरता से ले रहा है। भारत को कभी मानवाधिकार कभी लोकतांत्रिक व्यवस्था तो कभी आर्थिक सुधार के मुद्दे पर घेरने वाली यह शक्तियां लगातार भारत विरोधी एजेंडा पर काम कर रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी या मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बैंक खातों को आयकर विभाग द्वारा जब्त करने के सवाल वाशिंगटन में उठे हैं। भारत के अंदरूनी मामलों में टिप्पणी के लिए भारत ने अमेरिका और जर्मनी से अपनी नाराजगी जताई थी। दोनों भारत के करीबी रणनीतिक साझेदार देश हैं जिनसे द्विपक्षीय रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं फिर भी भारत ने इन्हे सख्त संदेश देने में कोताही नहीं की।

जिस तरह से भारत की न्यायिक प्रणाली पर संदेह जताया गया उसको काफी गंभीरता से लिया गया है। उसमें भारत को बदनाम करने की साजिश देखी जा रही है। भारत की कूटनीति के संदर्भ में यह बात कही गई होती तो विदेश मंत्रालय भी प्रतिक्रिया जताकर मामला दफा कर देता। लेकिन न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाने या लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निशाना बनाने पर मामला गंभीर हो जाता है। इन देशों में सक्रिय कुछ शक्तियां भारत को किसी न किसी मामले में घेरने की कोशिश करती हैं। कभी मीडिया में आलेख के जरिए तो कभी सरकारी या गैर सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट के जरिए ऐसा किया जाता आ रहा है। यह पुरानी परंपरा है और भारत का कड़ा जवाब इन्हें नागवार गुजरता है।

यह पहला मौका नहीं है जब भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की तरफ से कोई टिप्पणी की गई है। पहले भी ऐसा हो चुका है। अमेरिका यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के कई समाचार पत्रों में भी हाल ही के दिनों में भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए आलेख प्रकाशित किए गए हैं। एक तरफ यह देश भारत के साथ संबंध मजबूत करने के लिए आतुरता दिखाते हैं वहीं दूसरी तरफ किसी न किसी बहाने भारत की कानून व्यवस्था व लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा करने के लिए भी तैयार रहते हैं। भारत के मामलों में दखल देने पर भारत सरकार की तीखी प्रतिक्रिया से अब दुनिया भर के देशों को समझ जाना चाहिए कि यह नया भारत है और आज का भारत किसी भी बाहरी दखल को सहन नहीं करता है।

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