February 14, 2026

क्या कांग्रेस को आई.एन.डी.आई.ए. में मजबूती मिल पाएगी?

भले ही आई.एन.डी.आई. गठबंधन के कुछ दल नीतीश कुमार को संयोजक की भूमिका सौंपने पर सहमति बनाने में जुटे हुए हैं लेकिन इससे यह नहीं लगता कि ऐसा करने से गठबंधन को मजबूती मिल जाएगी। असली समस्या लोकसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे के लेकर सामने आएगी, जब सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस से ही त्याग करने की इच्छा रखेंगे। कांग्रेस पार्टी भी इन दलों की नीयत से परिचित है इसीलिए कांग्रेस ने हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में गठबंधन में शामिल दलों को कोई महत्व नहीं दिया था।

नीतीश कुमार भी सिर्फ विपक्षी गठबंधन के संयोजक के रूप में अपनी भूमिका अदा करने की इच्छा मात्र नहीं रखते बल्कि वे यह भी चाहते हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में भी पेश किया जाए। कांग्रेस पार्टी ऐसा कभी नहीं कर पाएगी क्योंकि ऐसे प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त करना उसके लिए स्वयं अपनी कब्र खोदने जैसा होगा। विपक्षी गठबंधन सीट बंटवारे को लेकर उलझन में है। घटक दलों की कई बैठकों के बावजूद किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका है। सीट बंटवारे का न फार्मूला तय हो पाया है और न ही बातचीत के लिए कोई तिथि निर्धारित है। कहीं क्षेत्रीय दलों की अपेक्षा बड़ी है तो कहीं कांग्रेस अपनी जमीन छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। अपने अपने राजनीतिक आधार वाले राज्यों में जदयू, राजद, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस एवं शिवसेना कम सीटों पर तालमेल के लिए तैयार नहीं है। कांग्रेस को यह भी शंका है कि गठबंधन के दल उसे ऐसी सीटों पर लड़ने के लिए मजबूर कर सकते हैं जिन पर हार की आशंका अधिक है।

कांग्रेस ने 2019 के संसदीय चुनावों में 52 सीटें जीती थी एवं 209 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी। इस हिसाब से 261 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी प्रबल है। शेष 282 सीटें सहयोगी दलों के लिए बच जाती है। लेकिन कांग्रेस की दावेदारी उन सीटों पर भी है जिन पर उसकी जमानत बच गई थी। इस हिसाब से कुल 273 सीटों पर कांग्रेस की दावेदारी मजबूत है। ऐसे में सहयोगी दलों के पास लड़ने के लिए 270 सीटें ही बच पाएंगी।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बसपा का पेंच फंसा हुआ है। कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व मायावती से गठबंधन में शामिल होने के लिए गंभीरता से विचार करने का आग्रह कर रहा हैं और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव बसपा को जगह देने के लिए राजी नहीं है। पंजाब में कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी के तालमेल की संभावना लगभग खत्म हो गई है और दिल्ली में भी पेंच फंसा हुआ है। दिल्ली में कांग्रेस 2019 के प्रदर्शन के आधार पर हिस्सेदारी चाहती है। तब 5 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर थी किंतु आम आदमी पार्टी चार सीटों से कम पर तैयार नहीं है।

कांग्रेस ने लंबी अवधि तक शासन किया है।उसे सत्ता हासिल करने में हड़बड़ी की जरूरत नहीं है। उसे अपनी विचारधारा, संगठन, नेतृत्व और नीतिगत कमजोरी पर ध्यान देने की आवश्यकता है। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में, वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में तथा दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस से उसकी राजनीतिक जमीन छीनी है। अपनी जमीन वापस लेने की अपेक्षा कांग्रेस आई.एन.डी.आई.ए. के माध्यम से उन्हीं दलों पर आश्रित होने के लिए आमादा नहीं हो सकती है। कांग्रेस को आई.एन.डी.आई.ए. से अलग रहकर भावी राजनीति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

लोकतंत्र में कोई पार्टी सत्ता में स्थाई रूप से नहीं रहती। कांग्रेस को इंतजार करना चाहिए और स्वयं को उस समय के लिए तैयार करना चाहिए जब जनता को भाजपा के विकल्प की तलाश होगी। आई.एन.डी.आई.ए में आकर कांग्रेस जनता का विश्वास अर्जित करने और देश की बागडोर संभालने की बजाय मोदी हटाने को वरीयता दे रही है जो राजनीतिक दृष्टि से अपरिपक्व राजनीति है। यदि कांग्रेस को लोकतांत्रिक स्पर्धा में सार्थक रूप से टिके रहना है तो उसे इन सभी गलतियों को सुधारना होगा व अपनी राष्ट्रीय पार्टी की पहचान को बनाए रखना होगा।

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