भगवान सदा अपने भक्तों के भक्ति भाव में बंधे होते हैं- भक्ति प्रसाद गिरी जी
दौलतपुर चौंक, संजीव डोगरा, 31 अक्टूबर गगरेट विधानसभा क्षेत्र के दौलतपुर चौक के माता कुहा देवी मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन भागवताचार्य भक्ति प्रसाद गिरी जी ने राजा परीक्षित एवं उनके चरित्र वर्णन की शुकदेव भगवान का आगमन की कथा सुनाई। कथा व्यास ने कहा कि कलयुग के प्रभाव से राजा परीक्षित ने ऋषि श्रृंगी के गले में मरा हुआ सर्प डाल दिया था और ऋषि ने उन्हें श्राप दिया कि ठीक सातवें दिन सर्प के काटने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। उसी श्राप के निवारण के लिए वेद व्यास द्वारा रचित भागवत कथा शुकदेव द्वारा सुनाई गई, जिससे उनका उत्थान हो गया। उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित ने सात दिन भागवत सुनकर किस तरह अपना उद्धार कर लिया। उसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को भागवत का महत्व समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि भागवत अमृत रूपी कलश है। जिसका रसपान करके आदमी अपने जीवन को कृतार्थ कर लेता है। इसलिए जहां भी भागवत होती है, वहां जाकर कथा अवश्य सुननी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन आदमी को बार-बार नहीं मिलता इसलिए इस कलयुग में दया ,धर्म, भगवान के स्मरण से ही सारी योनियों को पार करता है। उन्होंने मनुष्य जीवन का महत्व समझाते हुए कहा कि भगवान की भक्ति में अधिक से अधिक समय देना चाहिए। उन्होंने बताया कि भगवान सदैव ही अपने भक्तों के भक्ति भाव में बंधे होते हैं और वे भक्तों की पुकार को कभी भी अनसुना नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि भक्त पर विपदा आने पर भगवान स्वयं ही उसे हरने के लिए कष्ट सहते हैं, किन्तु भक्तों को कोई कष्ट नहीं होने देते। उन्होंने कहा कि इस कलयुग रूपी भवसागर से पार करने का एकमात्र उपाय प्रभु का नाम सिमरन करना है। प्रभु नाम सिमरन करने पर ही भवसागर से पार पाया जा सकता है। कथा व्यास ने बताया कि धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि जैसा अन्न हम खाते हैं, हमारी बुद्धि भी वैसे ही हो जाती है। उन्होंने कहा कि अन्न ग़लत ढंग से अर्जित धन से आया है,तो हमारी बुद्धि पथभ्रष्ट हो जाती है, जबकि परिश्रम से अर्जित धन से आया अन्न हमें धर्म कर्म की ओर उन्मुख करता है। उन्होंने महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश दे रहे थे तो उस समय द्रोपदी भीष्म पितामह के मुंह से धर्म की बातें सुनकर द्रोपदी हंस पड़ी तो भीष्म पितामह ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा” बेटी द्रोपदी तुम्हारा हंसना बिल्कुल सही है। क्योंकि मैं उस समय दुर्योधन का अन्न खाता था। इसी कारण मेरी बुद्धि मलिन हो गई थी। इस अवसर पर राकेश कुमार, संजीव शर्मा, यशपाल,मीतू, रोहित,देसराज आदि भी उपस्थित रहे।
